परोपकार सबसे बड़ा धर्म: मोरारी बापू
मोरना (मुजफ्फरनगर)। कथा मर्मज्ञ मोरारी बापू ने अमृत वर्षा करते हुए कहा कि सबसे बड़ा धर्म परोपकार है। शरीर के कण-कण में कथा समा जाए, तो समझना कथा में आना सफल हो गया। तीर्थ धाम, प्रेम भाव, गंगा, कृष्ण सभी में कथा व्याप्त है, बस समझने को शुद्ध नेत्र चाहिए। मन मेें तुम्हारे जो हो ठीक है, लेकिन आत्मा को पवित्र रखो। कथा को सही प्रकार से श्रवण नहीं करोगे तो भगवान तुम्हारा त्याग कर देंगे।
बुधवार को धर्मनगरी शुकतीर्थ गंगा घाट पर आयोजित श्रीराम कथा के पांचवें दिन अमृत वर्षा करते हुए कथा व्यास मोरारी बापू ने कहा कि सत्य परम है, असत्य हमेशा हारता है। वह धर्म ही नहीं, जिसमें सत्य न हो। कथा में जो प्राप्त हो मानव जीवन के लिए पर्याप्त है। अंतर्मन में जो बात आए उसे विवेक से बताएं। कोई कितनी भी ऊंचाई पर चला जाए, गुरु से हमेशा नीचा ही रहेगा। उसको गुरु की शरण में जाना ही पड़ेगा। जीवन रूपी दीप बुझने से पहले आत्मा के हरि के नाम का दीप जलाने के लिए मात्र विकल्प श्रीराम कथा है। श्रोता विनयी, संयमी, धार्मिक होना चाहिए, अधर्मी नहीं। कथा को धार्मिक वेश में नहीं, नागरिक वेश में सुने तो जरूर लाभ होगा। पानी का स्वभाव है कि गहरे गड्ढे में पहले जाता है, ऐसे ही महापुरुष दरिद्र के घर पहले जाते हैं। अपने घर में हरि की पूजा करें, कर्म की तुम्हारी पूजा है। उन्होंने कहा कि जहां असत्य हो, उस सभा से उठकर चले जाना बेहतर है। श्रोता का विकास अच्छी निशानी व शगुन है। महाभारत में नारी के अपमान पर पितामह भीष्म चुप रहे। वहीं, रामायण में रावण ने नारी का अपमान किया तो माल्यवंत सभा से उठकर चले गए। जब कोई सामने वाले को विरोधी मान ले, तो उसका कोई उपाय नहीं। गुरु, मित्र, माता- पिता व कथाओं में बिना निमंत्रण के दृढ़ता के साथ जाएं। मोरारी बापू ने कहा कि जिस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्थापित न हों तो वह यज्ञ सफल नहीं रहता। दुनिया में किसी की निंदा नहीं करे ना हा सुनें। निंदा का विरोध न कर सकें तो वहां से अपने कान बंद कर चले जाएं। ईर्ष्या, निंदा व द्वेष न करें। विकासशील लोगों के साथ प्रेम करुणा करें, जिसके जीवन में श्रद्धा है, वहां संत बिना बुलाए चले आते हैं। कलियुग बहुत अच्छा है। जो कर रहे हैं उसका फल साथ- साथ मिलता है।