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नोटबंदी से टूटी उद्योगों की कमर, बैंकों में अभी तक है नोटों का संकट

Thu, 29 Dec 2016 12:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
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एटीएम के बाहर लगी भीड़। - फोटो : अमर उजाला
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नोट बंदी के 50 दिन बाद भी ग्राहकों को बैकों से पर्याप्त धन नहीं मिला रहा है। अभी भी बैंकों में नोटों का संकट है, जिससे पब्लिक परेशान और लाचार है। रोजमर्रा के खर्च के लिए धन लेने को नागरिकों के ये 50 दिन बैंकों और एटीएम की लाइनों में ही गुजर गए। ग्राहकों को पुलिस की लाठियां खाकर भी पर्याप्त धन नहीं मिला। बावजूद नागरिक सरकार के नोटबंदी के फैसले के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रशासन और बैंकों की अव्यवस्था को लेकर गुस्साए हैं। उधर, नोट बंदी ने जनपद के इस्पात, पेपर, कोल्हू उद्योग की कमर तोड़ दी। यहां का रेडीमेड कारोबार पूरी तरह से ठप हो गया। साथ ही दवा और गुड़ कारोबार भी प्रभावित हुआ।      
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बैंकों पर रही मारामारी, हंगामे हुए नो कैश से जूझती रही जनता      
सरकार ने आठ नवंबर को नोट बंदी का फैसला सुनाया था। अगले ही दिन से बैंकों पर पुराने नोट बदलने, जमा करने को लेकर मारामारी मचनी शुरू हो गई। पहले आठ दिनों तक प्रतिबंधित नोट बदलने को लेकर शहर से लेकर देहात तक के बैंकों में खूब आपाधापी मची रही। बैंकों और प्रशासन की ओर से कोई सुचारु व्यवस्था नहीं बनाने के कारण बैंकों पर आए दिन हंगामे हुए। नोट बंदी के पहले ही दिन सुजडू की पीएनबी शाखा पर तोड़फोड़ हुई।

पुलिस और पब्लिक के बीच टकराव होने पर पुलिस ने फायरिंग कर भीड़ पर लाठीचार्ज किया। गुस्साई भीड़ ने भी पुलिस पर पथराव किया। लाठीचार्ज और भगदड़ में बालिका समेत तीन महिलाएं घायल हो गईं। छपार, बसेड़ा, कुटेसरा, चरथावल, खतौली, मीरापुर, शाहपुर, बुढ़ाना, मंसूरपुर, लछेड़ा आदि बैंक शाखाओं पर भी हंगामे रहे। इन स्थानों पर भी पुलिस ने लाइन में लगे ग्राहकों पर लाठीचार्ज किया। पब्लिक ने लाठियां भी खाईं, मगर तब तक उन्हें पर्याप्त धन नहीं मिला।      
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सड़कों पर उतरे ग्राहक, जाम 
नोटबंदी के चलते यह आलम रहा कि नागरिक कैश लेने के लिए सुबह सवेरे छह बजे ही बैंक के बाहर लाइन में लगते थे। बैंक खुलने पर उन्हें नो कैश का नोटिस मिलता था। ऐसे में गुस्साए ग्राहक सड़कों पर उतरे। चरथावल, मोरना, खतौली, शाहपुर, शहर में सुजडू चुंगी, मीरापुर, बुढ़ाना, पुरकाजी में लोगों ने जाम लगाए।      

बैंककर्मियों को बंधक भी बनाया      
सुबह से लेकर शाम तक लाइन में लगने के बावजूद ग्राहकों को जब कैश नहीं मिला तो उन्होंने बैंक कर्मियों को बंधक बनाकर अपना रोष प्रकट किया। मीरापुर, बसेड़ा, छपार, बझेड़ी, खुड्डा, रोहाना, लछेड़ा, खतौली, कुटेसरा में ग्राहको ने बाहर से बैंक की तालाबंदी कर कर्मचारियों को बंधक बनाया, जिन्हें बाद में पुलिस ने बंधन मुक्त कराया।      

लड़कियों की शादी में ढाई लाख के लाले पड़े      
नवंबर के अंतिम सप्ताह और दिसंबर के पहले सप्ताह में विवाद शादी पहले से ही निर्धारित थी। नोट बंदी इसी दौरान हुई। जिससे बिटिया की शादी करने में परिजनों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। परेशान देख कर नियम बनाया गया कि शादी का कार्ड दिखाने पर ढाई लाख रुपये मिलेंगे, मगर ऐसा नहीं हो सका। शादी के ढाई लाख नहीं मिले। अनेक परिजनों ने बेटियों के साथ डीएम कार्यालय पहुंच कर धरना प्रदर्शन भी किया, मगर उसकी सुनवाई नहीं हो सकी।      

सर्वयूपी ग्रामीण बैंक सात दिन बंद रहे      
जिले में पीएनबी लीड बैंक है, उसने ही अपने ग्राहकों को निराश किया। पीएनबी की शाखाओं पर सुबह ही नो कैश के बोर्ड लग जाते थे। इसके एटीएम भी बंद पड़े रहे। सर्वयूपी ग्रामीण बैंक भी पीएनबी पर निर्भर है। कैश न मिलने के कारण जिले के तमाम सर्वयूपी ग्रामीण बैंक पर सात दिनों तक ताले लटके रहे। ग्राहकों के हंगामे से परेशान कर्मचारियों ने जिला मुख्यालय पर तीन दिनों तक धरना प्रदर्शन किया, तब जाकर उनके बैंक को कैश मिला।      

परवान नहीं चढ़ी कैश लेस व्यवस्था      
शहर और जिले में कैश लेस व्यवस्था परवान नहीं चढ़ सकी। शहर की कुछ बड़ी दुकानों पर ही स्वाइप मशीनें हैं। जिन दुकानदारों ने स्वाइप मशीनों की मांग बैंकों की, उनकी मांग को अभी तक बैंक पूरी नहीं कर सके हैं। पेटीएम, रुपये, ई-वॉलेट अभी यहां चलन नहीं हुआ है।      

किसानों पर पड़ी सबसे अधिक मार      
नोटबंदी से सबसे अधिक किसान प्रभावित हुए। सहकारी बैंकों में उनके रुपये जमा करने और निकालने पर शुरू में पाबंदी लगा दी गई थी। सहकारी समितियों ने भी प्रतिबंधित नोट स्वीकार नहीं किया, जिस कारण किसान  समितियों से खाद, बीज भी नहीं खरीद सका। गन्ना भुगतान बैंकों में पहुंचा, मगर बैंकों से भी उन्हें पर्याप्त भुगतान नहीं मिल सका।       

नोट बंदी से टूटी उद्योगों की कमर      
जिला लोहा और पेपर उद्योग के लिए जाना जाता है। नोटबंदी ने दोनों उद्योग की कमर तोड़ दी है। बिजली दरें बढ़ने से जिले की आधे से अधिक लोहा फैक्ट्री तो पहले से बंद थी, जो चल रही थी वो भी नोट बंदी से बंद हो गई। आईआईएम के पूर्व अध्यक्ष कुशपुरी का कहना है कि फैक्ट्री में 90 प्रतिशत कार्य कैश से चलता है। मजदूरों को भुगतान नकद देना पड़ता है, धन नहीं मिलने से समस्या उत्पन्न हुई। पेपर मिल मालिक पंकज अग्रवाल का कहना है जिले में अब  28 पेपर मिल ही चल रहे हैं, जो कच्चा माल न मिलने के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है।       

शहर का रेडीमेड कारोबार ठप हुआ      
नोटबंदी से शहर का रेडीमेड कारोबार ठप हो गया। साथ ही इस कारोबार से जुड़े सैकड़ों परिवारों के सामने ने भी रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। शहर के सदर बाजार में करीब 200 दुकानें रेडीमेट की है। दुकानदार कच्चा माल लुधियाना से लाते हैं, जिन्हें सिलाई के आसपास के परिवारों को देते हैं। रेडीमेट गारमेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बिजेंद्र गोयल का कहना है कि नोट बंदी के कारण इस बार पूरा कारोबार ठप हो गया। बना हुआ माल भी नहीं बिक सका है।      

गुड़ मंडी पर आर्थिक संकट छाया      
मुजफ्फरनगर की गुड़ मंडी का एशिया में प्रथम स्थान है। नोटबंदी से यहां की गुड़ मंडी में भी आर्थिक संकट छाया है। पर्याप्त धन नहीं मिलने से कोल्हू भी आधे बंद हो गए, जिससे मंड़ी में भी गुड़ की आवक आधी रह गई है। गुड़ काराबारी श्याम सिंह सैनी, अरुण खंडेलवाल का कहना है कि नोट बंदी से गुड़ मंड़ी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। दिसंबर में जहां गुड़ की आवक 12 हजार मन होती थी, वह अब मात्र पांच हजार ही रह गई है।      

नोट बंदी के झटके से दवा बाजार में मंदी      
नोटबंदी के झटके से दवा कारोबार में मंदी छाई है। बीते डेढ़ माह में जिले में 60 फीसदी दवाइयों का व्यवसाय ठप हो चुका है।  जिला परिषद और अग्रवाल मार्केट में थोक दवा की मंडी है। वेस्ट यूपी में आगरा के बाद सबसे ज्यादा दवाईयों का कारोबार मुजफ्फरनगर से होता है। यहां से अन्य प्रांतों मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब तक में दवा की आपूर्ति होती है। नोट बंदी के असर से दवा के थोक बाजार की रौनक गायब हो गई है। केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष रविंद्र सिंह बताते हैं कि जिले का दवा व्यापार नोट बंदी से बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। 60 फीसदी से ज्यादा बिक्री में गिरावट आई है।      
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