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मीरापुर उपचुनाव : हार से कमजोर पड़ी मुस्लिम राजनीति, मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से नहीं मिली है कामयाबी

Sat, 23 Nov 2024 10:43 PM IST
मोहम्मद मुस्तकीम अमर उजाला नेटवर्क, मुजफ्फरनगर

सार

2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम समीकरण बिखर गया। मुस्लिम मतदाता सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद किसी भी सीट पर निर्णायक साबित नहीं हो सके। 
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मतगणना स्तर पर सपा प्रत्याशी सुम्बुल राना का चेहरा उतरा रहा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पश्चिम यूपी में भले ही मुस्लिम समाज के दिग्गजों ने पिछले दो साल में खोई सियासी जमीन को वापस पाना शुरू कर दिया हो, लेकिन मुजफ्फरनगर में इंतजार खत्म नहीं हुआ। मीरापुर उपचुनाव में सुम्बुल राना की हार से जिले की मुस्लिम राजनीति फिर बड़ा नुकसान हुआ है। हार का असर 2027 में टिकट की दावेदारी पर भी पड़ेगा।
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सियासत के पन्ने पलटें तो नए परिसीमन से हुए 2012 के चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों से तीन मुस्लिम विधायक चुने गए थे। छह सीटों के जिले में सत्ता की यह आधी भागीदारी थी। बुढ़ाना से सपा के नवाजिश आलम, मीरापुर से बसपा के मौलाना जमील और चरथावल से बसपा के टिकट पर नूर सलीम राना विधायक चुने गए थे। यही नहीं सांसद भी कादिर राना थे।

सिर्फ एक साल बाद 2013 में मुजफ्फरनगर दंगा हुआ। जाट-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम समीकरण बिखर गया। अलग-थलग पड़े मुस्लिम मतदाता सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद किसी भी सीट पर निर्णायक साबित नहीं हो सके। पिछले 14 साल में मुस्लिम राजनीति हाशिए पर चली गई।
 

सियासत के पन्ने पलटें तो नए परिसीमन से हुए 2012 के चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों से तीन मुस्लिम विधायक चुने गए थे। छह सीटों के जिले में सत्ता की यह आधी भागीदारी थी। बुढ़ाना से सपा के नवाजिश आलम, मीरापुर से बसपा के मौलाना जमील और चरथावल से बसपा के टिकट पर नूर सलीम राना विधायक चुने गए थे। यही नहीं सांसद भी कादिर राना थे।

सिर्फ एक साल बाद 2013 में मुजफ्फरनगर दंगा हुआ। जाट-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम समीकरण बिखर गया। अलग-थलग पड़े मुस्लिम मतदाता सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद किसी भी सीट पर निर्णायक साबित नहीं हो सके। पिछले 14 साल में मुस्लिम राजनीति हाशिए पर चली गई।
 

साल 2022 में रालोद-सपा गठबंधन के दम पर वापसी की उम्मीद बंधी, लेकिन हाथ से टिकट फिसल गए। 2024 आते-आते रालोद और सपा की राह अलग हो गई। इसका असर मुस्लिम सियासत पर दिखा। मीरापुर के उपचुनाव में सुम्बुल राना को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद कांटे के मुकाबले के आसार थे। यह माना जा रहा था कि विधानसभा में जिले से मुस्लिम समाज का खाता खुल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। हार का असर 2027 तक भी जाने की संभावना है। मतदान के दिन जिस तरह मुस्लिम अकेले और अलग-थलग पड़ते नजर आए, इससे टिकट की दावेदारी भी कमजोर होगी।
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इकरा हसन की सर्वसमाज में स्वीकार्यता
कैराना की सपा सांसद इकरा हसन की सर्वसमाज में स्वीकार्यता नजर आती है। पश्चिम यूपी में मुस्लिम समाज की तरफ से वह अकेला ऐसा चेहरा है, जिसे हर जगह तवज्जो मिलती है। मीरापुर उपचुनाव के बाद प्रचार में पहुंची तो भीड़ इस तरह बढ़ी कि प्रचार करना मुश्किल हो गया। जौली गंगनहर से वापस लौटना पड़ गया था।

यहां मुस्लिम नेताओं के बडे़-बड़े नाम
जिले में मुस्लिम राजनीति के बड़े-बड़े नाम हैं। इनमें पूर्व मंत्री सईदुज्जमा, पूर्व सांसद अमीर आलम खान, पूर्व सांसद कादिर राना, पूर्व विधायक नवाजिश आलम खान, पूर्व विधायक नूर सलीम राना, पूर्व विधायक शाहनवाज राना, पूर्व विधायक मौलाना जमील भी हैं।
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