श्री मनकेश्वर महादेव मंदिर मानकी
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स्वयं में इतिहास समेटे है मानकी का सिद्धपीठ श्री मनकेश्वर महादेव मंदिर
देवबंद (सहारनपुर) सिद्धपीठ श्री मनकेश्वर महादेव मंदिर मानकी स्वयं में इतिहास समेटे हुए है। इस मंदिर की मान्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भगवान शिव ने समुंद्र मंथन के दौरान मानकी गांव की धरा पर ही आसान जमाया था। जिससे इस मंदिर की मान्यता भी नीलकंठ महादेव के मंदिर के समान ही मानी जाती है।
देवबंद से करीब चार किमी दूरी पर स्थित श्री मनकेश्वर महादेव मंदिर में प्रदेश ही नहीं अपितु अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए माथा टेकने स्वयंभू प्रकट शिवलिंग के दर्शन को मानकी गांव में आते हैं। मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना होने के साथ ही अपने अंदर विभिन्न प्रकार की चमत्कारिक घटनाओं को समेटे हुए है। मंदिर के स्थापित वाली भूमि गाड़ा बिरादरी के एक मुस्लिम परिवार की थी। बताया जाता है कि किसान अपने खेत में जुताई कर रहा था। उसी दौरान उसका हल एक पत्थर से टकरा गया। पत्थर का कोना टूटने के बाद उसमें से खून व दूध की धारा बहने लगी। किसान घबराकर उस पत्थर पर मिट्टी डालकर अपने घर चला गया। अगले दिन जब वह पुन: खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि पत्थर से मिट्टी हटकर वह ऊपर की तरफ आ गया। जब उसने पत्थर के इर्द-गिर्द से मिट्टी हटानी शुरू की तो पत्थर पुन: जमीन में समाने लगा। इसके बाद उस किसान ने अपनी जमीन मंदिर के लिए छोड़ दी। तभी से यह मंदिर सिद्धपीठ होने के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन गया है। सिद्धपीठ के महंत राजपाल सिंह, सुभाष और मुन्नू ने बताया कि भगवान शिव ने मंथन के दौरान मानकी गांव में आसन लगाने के उपरांत नीलकंठ महादेव मंदिर पर आसन लगाया था। उन्होंने बताया कि इस धरा पवित्र से स्वयंभू ज्योर्तिलिंग प्रकट हुए हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए 36 वर्ष पूर्व गांव के प्रधान अल्लादिया ने मंदिर को ओर तीन बीघा भूमि जमीन दान दी थी। इतना ही नहीं सिद्धपीठ पर प्रतिवर्ष श्रावण की चतुर्दशी तिथि का विशाल मेला आयोजित किया जाता है। जहां पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु ही नहीं बड़ी संख्या में कांवड़िएं भी भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।