मुजफ्फरनगर। रामपुर तिराहा कांड में 32 साल पहले पुलिस की मनमानी एक बार फिर साबित हुई। सीबीआई की जांच पर अदालत ने सजा की मुहर लगाई। पुलिसकर्मियों ने देहरादून में खड़ी जीप को बागोवाली में बस दर्शाकर खुखरी भी बरामद दिखाई थी। अदालत में जीप मालिक राजेंद्र कुमार की गवाही महत्वपूर्ण साबित हुई। दूसरे पंजीकरण नंबर की कोई बस या अन्य वाहन ही सीबीआई जांच में नहीं मिला।
गाजियाबाद में रह रहे सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रज किशोर रामपुर तिराहा कांड के समय झिंझाना थाना प्रभारी थे। उन्होंने दो अक्तूबर 1994 को बसों की चेकिंग की। प्राथमिकी में बस नंबर यूपी 07-0183 से खुखरी बरामद दिखाई। सीबीआई ने वाहन मालिक देहरादून के त्यागी रोड निवासी ट्रांसपोर्टर राजेंद्र सिंह को अदालत में पेश किया।
उन्होंने बताया कि 1994 में पड़ोसी राजेश कुमार से महेंद्रा जीप खरीदी थी। गाड़ी को चमोली में दोस्त महफूज के पास भेज दिया था, वह लोकल में इसका संचालन कर रहा था। अलग राज्य की मांग के लिए चल रहे आंदोलन में जीप नहीं भेजी गई। गवाह के बयान से पुलिसकर्मियों की कहानी पर सवाल खड़े हुए।
पुलिस ने बस संख्या- यूकेई 1094 से दो तमंचे और पांच कारतूस बरामद दर्शाए लेकिन सीबीआई की जांच में इस नंबर का कोई वाहन पंजीकृत नहीं मिला।
उत्तराखंड परिवहन निगम की बस संख्या यूटीएस-1695 के परिचालक विनोद कुमार भट्ट ने स्वीकार किया कि वह ऋषिकेश से दिल्ली के लिए आंदोलनकारियों को लेकर जा रहा था। रामपुर तिराहा पर पुलिस ने बर्बरता की। आंदोलनकारी बस से उतरकर इधर-उधर भाग गए थे। ड्राइवर शिव सिंह गोसाई के साथ वह बस में ही थी लेकिन पुलिस ने हमारी बस से कोई तमंचा या खुखरी बरामद नहीं की।
पुलिस की कहानी झूठी पाए जाने के बाद 31 जुलाई 1995 को सीबीआई ने चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।
विवादित फर्द के कारण भी फंस गई गर्दन
उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलकारियों की रोकने की कार्यवाही एक अक्तूबर से दो अक्तूबर 1994 के दिन तक चलती रही। सीबीआई ने कहा कि अभियुक्त ब्रजकिशोर ने विवादित और फर्जी फर्द बरामदगी दिखाते हुए लिखा है कि तलाशी की कार्यवाही दो अक्तूबर को सुबह साढ़े 11 से दोपहर एक बजे तक चलती रही। पुलिस ने बरामदगी का स्थान बागोवाली पुलिया दिखाया, जबकि जांच में रामपुर तिराहा साबित हुआ।
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पुलिस को आई बारुद की बू...रिपोर्ट में नहीं
पुलिस ने रामपुर तिराहा के आंदोलनकारियों की बसों से तमंचे बरामद दिखाए थे। पुलिस का कहना था कि जब तमंचे बरामद किए गए तो बारुद की बू आ रही थी लेकिन अभियोजन साक्षी अभिजित डे ने रिपोर्ट में कहा कि तमंचों से गोली कब चली थी, यह सीएफएसएल रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं हुआ।
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आंदोलनकारियों के पास नहीं थे हथियार
अदालत में गवाह महेंद्र सिंह ने बयान दिया कि एक अक्तूबर 1994 की रात नौ बजे 70-80 आकर रुकी थी। पुलिस ने ट्रक लगाकर गाड़ियों को रोक लिया। साढ़े नौ से दस बजे के बीच आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच झगड़ा हुआ और रात एक बजे तक चलता रहा। आंदोलनकारी हमारे होटल आए और फिर हमारे साथ रामपुर गांव गए थे, उनके पास कोई हथियार नहीं था। सौ से दो सौ लोगों को गांव में खाना खिलाया गया।