मुजफ्फरनगर। सपा के नवनिर्वाचित सांसद हरेंद्र मलिक 31 साल बाद चुनाव जीते हैं। आखिरी बार 1993 में बघरा विधानसभा से वह विधायक चुने गए थे। इसके बाद राज्यसभा सांसद रहे। मुजफ्फरनगर और कैराना से लोकसभा के चार चुनाव हारने के बाद पांचवीं बार उन्हें जीत मिली है।
बघरा क्षेत्र के काजीखेड़ा गांव में जन्मे और शहर के प्रेमपुरी में रह रहे सपा प्रत्याशी हरेंद्र मलिक (69) पश्चिम की राजनीति में पहचान के मोहताज नहीं है। सियासत में हरेंद्र मलिक की गिनती व्यक्तिगत जनाधार वाले नेताओं में होती है। दिलचस्प बात यह है कि 1993 में बघरा विधानसभा सीट से हरेंद्र मलिक ने जनता दल के टिकट पर भाजपा के प्रदीप बालियान को हराया था। विधानसभा चुनाव में यह उनकी आखिरी जीत थी।
1996 के विधानसभा चुनाव में प्रदीप बालियान ने हरेंद्र मलिक को हराया। मलिक ने इसके बाद लोकसभा चुनाव का रुख किया लेकिन 1998 में सपा के टिकट पर मलिक को भाजपा के सोहनवीर सिंह ने 22724 वोटों से हरा दिया। इसके बाद उन्हें 1999 में दोबारा सपा ने चुनाव लड़ाया, लेकिन 112499 वोटों के साथ वह चौथे स्थान पर खिसक गए थे। साल 2009 में कांग्रेस के टिकट पर भी 73848 वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे। दस साल बाद 2019 में मलिक ने कैराना लोकसभा सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और 69355 वोट हासिल कर वह तीसरे स्थान पर रहे थे।
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बेटे की राजनीति में कराई सफल एंट्री
हरेंद्र मलिक ने अपने बेटे पंकज मलिक की राजनीति में सफल एंट्री कराई। पंकज मलिक ने बघरा से पहला चुनाव 2004 में लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इसके बाद पंकज मलिक बघरा, शामली और चरथावल से तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं।
छात्र राजनीति से निकलकर पहुंचे संसद
नवनिर्वाचित सांसद हरेंद्र मलिक ने पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति की। 1982 में बीडीसी का चुनाव लड़ा। उनके भाई बघरा के प्रमुख रहे थे। 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने उन्हें खतौली से टिकट दिया तो वह विधायक चुने गए। इसके बाद तीन बार बघरा से विधायक रहे। इंडियन नेशनल लोकदल से वह राज्यसभा सांसद भी रहे।