कवाल कांड की कथित वीडियो का सच तीन साल बाद भी पुलिस सामने नहीं ला सकी। जिस फेसबुक के एकाउंट से यह वीडियो शेयर की गई थी, उस एकाउंट का भी पुलिस और एसआईटी खुलासा नहीं कर सकी। पुलिस ने इंटरपोल की मदद लेकर फेसबुक मुख्यालय से जानकारी लेनी चाही, मगर यूएसए स्थित फेसबुक मुख्यालय ने एकाउंट आईडी की डिटेल देने से इंकार कर दिया। जिस कारण पुलिस सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम के खिलाफ दर्ज मुकदमे में चार्जशीट भी नहीं लगा सकी।
कवाल कांड के तुरंत बाद विधायक संगीत सोम की फेसबुक से कवाल की कथित वीडियो क्लिप शेयर करने के मामले से सियासत गरमा गई थी। शासन के आदेश पर पुलिस ने संगीत सोम के खिलाफ शहर कोतवाली में मुकदमा अपराध संख्या 1118/13 पर धारा 153ए, 420, 120 बी आईपीसी एवं 66ए आईटी एक्ट में अभियोग पंजीकृत किया था। बाद में विधायक को गिरफ्तार कर जेल भेजने के साथ ही रासुका भी लगाई गई थी।
इस मुकदमे की पुलिस और एसआईटी ने तफ्तीश की, मगर किस एकाउंट से यह क्लिप शेयर की थी, इस एकाउंट का पुलिस और एसआईटी तीन साल बाद भी खुलासा नहीं कर पाई है। जांच के दौरान एसआईटी और पुलिस ने फेसबुक मुख्यालय को चिट्ठी लिखी थी। साथ ही इसके लिए इंटरपोल की भी मदद ली गई थी, मगर फेसबुक मुख्यालय ने फेसबुक एकाउंट की आईडी देने से इंकार कर दिया था। जिस कारण इस मुकदमे में चार्जशीट भी नहीं लग सकी है।
तीन साल बाद भी पूरी नहीं हुई वादी की गवाही
कवाल कांड में हुए ममेरे भाईयों सचिन, गौरव की हत्या के मुकदमे में तीन साल बाद भी वादी की कोर्ट में गवाही पूरी नहीं हो सकी। इस मुकदमे में अभी तक तारीख पर तारीख लग रही है। वादी रविंद्र सिंह की गवाही के लिए अब कोर्ट में नौ सितंबर की तारीख लगी है। उधर, दोहरे हत्याकांड के पांच हत्यारोपी तभी से जेल में बंद हैं, उनकी जमानत की अर्जी हाईकोर्ट इलाहाबाद में लंबित है।
तीन साल पहले हुए कवाल कांड में मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। दोहरे हत्याकांड में गौरव के पिता रविंद्र सिंह की ओर से जानसठ कोतवाली पर कवाल निवासी मुजस्सिम, मुजम्मिल, फुरकान, जहांगीर, नदीम, अफजाल और मृतक शाहनवाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया था। एसआईटी ने जांच के बाद अफजाल की लोकेशन आंध्र प्रदेश में पाई जाने पर उसे क्लीनचिट देकर पांच आरोपियों मुजस्सिम, मुजम्मिल, फुरकान, जहांगीर, नदीम के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दी थी।
ये पांचों तभी से जेल में बंद हैं। सेशन कोर्ट से जमानत अर्जी खारिज होने पर हाईकोर्ट इलाहाबाद में जमानत अर्जी अभी तक लंबित है। उधर, इस हत्याकांड की सुनवाई एडीजे-नौ ओमवीर सिंह की कोर्ट में चल रही है। तीन साल से इस मुकदमे में तारीख पर तारीख लग रही हैं। तीन साल बाद भी मुकदमे के वादी रविंद्र सिंह की गवाही पूरी नहीं हो सकी है। वादी पक्ष के अधिवक्ता अनिल जिंदल ने बताया कि वादी की गवाही के लिए कोर्ट में अब नौ सितंबर की तारीख लगी है।
शाहनवाज हत्याकांड में हुआ परिवाद स्वीकार
कवाल कांड में मारे गए शाहनवाज की हत्या में उसके पिता सलीम की ओर से मृतक सचिन, गौरव के अलावा प्रहलाद, बिशन, देवेंद्र, योगेंद्र, जितेंद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। एसआईटी ने जांच के दौरान इस मुकदमे में एफआर लगा दी थी, जिस पर वादी पक्ष ने कोर्ट में एतराज दाखिल किया था। कोर्ट ने जिसे स्वीकार करते हुए एफआर को खारिज कर इसे परिवाद के रूप में दर्ज कर लिया था, मगर अभी तक इसमें कोई सुनवाई नहीं हुई है।
सांप्रदायिक बवाल की डीजीपी ने मांगी रिपोर्ट
डीजीपी जावीद अहमद ने 2013 के दंगे से लेकर अब तक जिले में हुए सांप्रदायिक बवालों की रिपोर्ट एसएसपी से मांगी है। शासन स्तर पर दंगे की पत्रावलियों को लेकर आला अफसर कोई चूक नहीं करना चाहते हैं। जिले में सात सितंबर के दंगे के बाद अभी तक जो भी सांप्रदायिक संघर्ष और बवाल हुए हैं, उनकी रिपोर्ट मांगी गई है। डीजीपी के निर्देश के बाद पुलिस विभाग पूरी रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है। रिपोर्ट में बवाल की वजह, विवेचना की स्थिति, किन बिंदुओं पर कार्रवाई हुई, दंगे में मृतकों और घायलों की विस्तृत जानकारी रिपोर्ट का हिस्सा रहेगी।
सबूतों के अभाव में 27 आरोपी हो चुके बरी
तीन साल पहले जिले में भड़के दंगों के दौरान विभिन्न थानों पर दर्ज हुए मुकदमे अब कोर्ट में ट्रायल पर हैं। विभिन्न अदालतों में दंगे के 165 मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से 127 मुकदमे सेशन कोर्ट में चल रहे हैं। तीन साल में अभी तक केवल चार मुकदमों का ही निस्तारण हुआ है, इन मुकदमों में साक्ष्य के अभाव में 27 आरोपी बरी हो चुके हैं। अभी तक दंगे के एक भी मुकदमे में किसी भी आरोपी को सजा नहीं मिल सकी है।
तीन साल पहले कवाल कांड को लेकर नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत से लौटते ग्रामीणों पर जिलेभर में कई स्थानों पर योजनाबद्ध तरीके से हमले हुए थेे। इसके बाद जिले में दंगा भड़क गया था। दंगे के दौरान जिले के शाहपुर, बुढ़ाना, फुगाना, मंसूरपुर, मीरापुर, शहर कोतवाली, भोपा, भौराकलां आदि थानों में हत्या, लूट, डकैती, गैंगरेप, दुष्कर्म, आगजनी, बलवा, हत्या के प्रयास आदि संगीन धाराओं 169 के मुकदमे दर्ज हुए थे।
एसआईटी की जांच के उपरांत कार्रवाई करते हुए आरोपियों को जेल भेजा गया तथा चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की गई। तभी ये दंगे के मुकदमे विभिन्न अदालतों में ट्रायल पर हैं। अभी तक फुुगाना थाने में दर्ज हत्या, रेप, आगजनी, लूट के चार मुकदमों का ही कोर्ट से फैसला आ सका। इन मुकदमों में साक्ष्य के अभाव में 27 आरोपी बरी हुए। जिला शासकीय अधिवक्ता दुष्यंत त्यागी ने बताया कि दंगे के दौरान 169 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें से चार का निस्तारण हो चुका है। बाकी 165 का ट्रायल चल रहा है। इनके 127 मुकदमे सेशन कोर्ट में और 38 मुकदमे विभिन्न लोअर कोर्ट में लंबित हैं।
मंत्री, सांसद, विधायकों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल
नंगला मंदौड़ की महापंचायत में शामिल होकर धारा 144 का उल्लंघन करने और भड़काऊ भाषण देने के आरोप में सिखेड़ा पुलिस केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान, बिजनौर सांसद भारतेंद्र सिंह, भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश राणा, साध्वी प्राची, पूर्व प्रमुख वीरेंद्र सिंह, उमेश मलिक, श्यामपाल चेयरमैन समेत 17 लोगों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। कोर्ट से जमानती वारंट जारी होने पर उक्त सभी ने कोर्ट में पेश होकर जमानती कराई है। इन मुकदमों की भी कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है।
कहां गई विष्णु सहाय आयोग की जांच रिपोर्ट
दंगे के बाद गठित जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट पर प्रदेश सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर पाई। 775 पन्नों की रिपोर्ट आयोग ने दो साल की जांच के बाद राज्यपाल और मुख्यमंत्री को सौंपी थी। रिपोर्ट में दंगे के लिए जहां अफसरों, पुलिस और खुफिया तंत्र की नाकामी को जिम्मेदार ठहराया गया था, वहीं नंगला मंदौड़ और खालापार की सभाओं के पीछे खड़े सियासी नेताओं को भी दंगा भड़कने की वजह माना था।
आयोग की रिपोर्ट को अन्य दलों ने महज लीपापोती बताकर खारिज कर दिया था। जस्टिस विष्णु सहाय ने 101 अधिकारियों और 377 ग्रामीणों के बयान दर्ज किए थे। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खुफिया विभाग के प्रभारी पीपी सिंह को जिले से स्थानांतरित कर दिया था। दंगे के दौरान तैनात रहे अधिकारियों की चूक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। दंगा पीड़ितों का कहना है कि सरकार ने अपने बचाव के लिए कमीशन गठित किया। सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ, लेकिन पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया। आखिर ऐसे आयोग के गठन का क्या औचित्य है।