गांव में प्रवेश से पहले ही गुड़ की महक करती है आनंदित
मुजफ्फरनगर। तितावी क्षेत्र के गांव नूनाखेड़ा के गुड़ की डिमांड देशभर में है। इस गांव में बना अधिकतम गुड़ कोल्हुओं पर ही बिक जाता है। आसपास के जनपदों के साथ दिल्ली और गाजियाबाद तक के लोग अपने परिवारों में प्रयोग के लिए यहां गुड़ लेने के लिए आते हैं। नूनाखेड़ा में कोल्हुओं की भरमार है। गांव में प्रवेश से पहले गुड़ की महक यहां अपनी ओर आकर्षित करती है। गांव में 500 लोगों को कोल्हुओं से रोजगार मिला है।
मुजफ्फरनगर-शामली मार्ग पर तितावी से कुटबा के लिए रास्ता जाता है। लखान गांव के निकलते ही नूनाखेड़ा के कोल्हुओं से निकलने वाली गुड़ की सौंधी महक यहां हर किसी को आनंदित करती है। जिले के किसान और आम लोग भी यहां के गुड़ को प्राथमिकता देते हैं। आसपास के जिलों सहित दिल्ली-गाजियाबाद के लोग प्रतिदिन यहां गुड़ लेने के लिए खड़े मिलते हैं। यहां का गुड़ देश के प्रत्येक कोने में पहुंच रहा है। खासियत है कि गुड़ बरसात में खराब नहीं होता है।
हमारी पीढ़ियां बनाती आ रही हैं गुड़
नूनाखेड़ा में कोल्हू संचालक कृष्ण कश्यप का कहना है कि उसका गुड़ मशहूर होने का कारण यह है कि वह पंजाब-88 के गन्ने से गुड़ बना रहा है। रिकवरी कम है, लेकिन ग्राहक के अच्छे दाम देने से उसे लाभ हो रहा है। उसका गुड़ 44 रुपये किलो तक बिक रहा है। हमारी पीढ़ियां गुड़ बनाती आ रही हैं। गांव में ही पूरे परिवार को रोजगार मिल रहा है।
गांव के कोल्हू संचालक सतीश कुमार कहते हैं कि बाजार में गुड़ के दाम काफी कम है। यहां अच्छे दाम में गुड़ नहीं बिकता तो हम लोग कोल्हू न चला पाते। जिस तरह चीनी और गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य है। इसी तरह गुड़ का भी होना चाहिए।
कोल्हू संचालक प्रेमपाल कहते हैं कि गुड़ बनाना यहां के लोगों का पुश्तैनी काम है। शुगर जैसी बीमारी से बचने के लिए लोग अपने घरों में गुड़ और शक्कर का इस्तेमाल करने लगे हैं। चार साल पहले गांव में पांच कोल्हू थे, अब 42 हो गए।
कोल्हू संचालक धर्मपाल कहते हैं कि इस क्षेत्र की मिट्टी गुड़ के हिसाब से बहुत अच्छी है। यहां के गन्ने के गुड़ में करारापन आता है और गुड़ स्वादिष्ट हो जाता है। यहां गुड़ बनाने वाले लोग शुद्ध बिना मसाले का गुड़ बना रहे हैं। इस कारण यहां लोग दूर-दूर से गुड़ खरीदने आते हैं।
गुड़ से जुड़ी है कश्यप समाज की रोजी-रोटी
गांव में इस समय 42 कोल्हू हैं। इन कोल्हुओं में 37 कोल्हू कश्यप समाज के हैं, चार कोल्हू जाट समाज के लोग चला रहे हैं, एक कोल्हू वैश्य समाज के एक व्यक्ति का है। सभी कोल्हू पर गुड़ पकाने का काम कश्यप समाज के लोग ही करते हैं।
500 लोगों को मिला हुआ है रोजगार
गुड़ बनाने के कोल्हुओं पर नूनाखेड़ा गांव में 500 लोगों को रोजगार मिला है। रोजगार पाने वालों में महिला और पुरुष दोनों हैं। एक कोल्हू पर दस से 12 लोग काम करते हैं। कोल्हू संचालक का पूरा परिवार गुड़ बनाने के कार्य में लगता है। (संवाद)