बचपन को संवारने की कोशिशें अभी अधूरी हैं। बाल दिवस पर पब्लिक स्कूलों में बच्चों ने रंगारंग खुशियां बांटीं, तो दूसरी ओर शहर की सड़कों और गलियों में चिल्ड्रेन-डे से बेखबर बचपन बदहाली से जूझता नजर आया। सरकारी महकमे की ओर से बाल दिवस पर कोई कार्यक्रम नहीं किया गया।
बाल अधिकारों को लेकर देश में कड़े कानून हैं। बच्चों के हक को दिलाने तथा बाल श्रम और उत्पीड़न से रक्षा को राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग गठित है। आजादी के 70 साल बाद भी बच्चों की दयनीय दशा की अभी सुनहरी तस्वीर दूर है। चाहे गांव हो या शहर छोटी उम्र में बच्चे बाल मजदूरी करते नजर आते हैं। गरीबी से जूझते परिवारों के बच्चे तो स्कूल जाने के बजाए रोजी-रोटी के लिए परिजनों के साथ मजदूर बने हैं।
मेरठ रोड पर मीनाक्षी चौक से सुजडू चुंगी तक सड़क फुटपाथ पर बच्चे मूंगफली भूनते दिखाई दिए। 11 साल के रवि को नहीं मालूम की आज बाल दिवस है। वह तो यह भी नहीं जानता कि देश में हर वर्ष चिल्ड्रेन-डे क्यों मनाया जाता है ? पिछले कई साल से वह सर्दी में वह मूंगफली बेचता है। आर्य समाज रोड पर बाइक मिस्त्री के यहां काम करने वाले असलम को उसके पिता ने छोटी उम्र में ही वर्कशॉप पर छोड़ दिया था। वह हर दिन ग्यारह घंटे काम करता है। असलम कहता है कि स्कूल जाते बच्चों को देख पढ़ने का मन करता है, लेकिन परिजन उसे मिस्त्री बनाना चाहते हैं।
अग्रवाल मार्केट में चाय की दुकान पर काम करने वाला कांशीराम आवास कालोनी का नकुल कहता है कि पिता की मौत के बाद उसे मजबूरी में पढ़ाई बीच में छोड़कर काम करना पड़ा। वह दिन भर एक दुकान से दूसरी दुकान पर चाय पहुंचाता है। मालिक कितने पैसे देता है, इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। कमला नेहरू वाटिका के बाहर कूड़ा बीनते दानिश से जब चाचा नेहरू के बारे में पूछा गया तो वह कोई जवाब नहीं दे सका। बचपन की बदहाली की ऐसी दास्तां अभी कम नहीं हुई है। हालांकि बाल अधिकारों को लेकर हर साल जागरूकता अभियान चलते हैं, लेकिन बाल दिवस पर सब नदारद रहे।
महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अफसर कोई कार्यक्रम नहीं कर पाए। बाल कल्याण समिति ने भी कोई पहल नहीं की। आर्यपुरी स्थित बाल संप्रेक्षण गृह में बंदी बच्चों के चेहरों पर चिल्ड्रेन-डे की खुशी भी मुस्कान नहीं दिला पाई। यदि कुछ होता भी तो गंगा स्नान की छुट्टी ने इन बंदियों को कुछ पल के लिए हंसने और गुनगुनाने का मौका छीन लिया। जिले में बाल श्रम के कानून की कोई परवाह नहीं है। सैकड़ों बच्चे सुबह टिफिन लेकर घर से मजदूरी के लिए निकलते हैं।
दिसंबर में बाल श्रम के विरुद्ध चलेगा अभियान
मुजफ्फरनगर। बाल श्रम से जुड़े नए कानून में दोषी पाए जाने पर जुर्माना धनराशि 10 हजार से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक यदि दुकान या फैक्ट्री में कोई बाल श्रमिक मिला तो तत्काल मालिक से बीस हजार रुपये का जुर्माना लिया जाता है। उस धनराशि को बैंक में जमा कर उसके ब्याज से बालक का पुनर्वास किया जाता है। सहायक श्रम आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने बताया कि दिसंबर माह में जिले में बाल श्रम के खिलाफ टीम गठित कर अभियान चलाया जाएगा।