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गंगा मंदिर से जुड़ी है तप और संस्कृति की महिमा    

Tue, 08 Nov 2016 12:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
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गंगा मंदिर। - फोटो : अमर उजाला
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श्रीमद्भागवत की उद्गम स्थली शुकतीर्थ की महिमा महर्षि शुकदेव मुनि की अमृत वाणी से है। तीर्थ में अक्षय वट वृक्ष के बाद 616 साल पुराना गंगा मंदिर अतीत की स्मृतियों को संजोए है। मंदिर की वास्तुकला, नक्काशी और गंगा मां की दुर्लभ मूर्ति अपने वैभव को दर्शा रही है।       
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भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम के मुख्य द्वार से पहले प्राचीन गंगा मंदिर का गौरवमयी इतिहास है। विक्रमी संवत 1401 में मंदिर का निर्माण हुआ था। वर्ष 1944 में वीतराग स्वामी कल्याण देव महाराज ने जब शुकतीर्थ के जीर्णोद्धार का महायज्ञ शुरू किया, तब भी गंगा मंदिर की महिमा सर्वत्र थी। मंदिर में गंगा मैय्या की मगरमच्छ पर सवार दुर्लभ मूर्ति है, जिसके समक्ष व्यास नंदन शुकदेव मुनि की प्रतिमा है। परिसर में ही शिव मंदिर भी है।

जिसमें छत के गोल गुंबद में श्री कृष्ण की लीलाएं दर्शाई गई हैं। भारतीय संस्कृति से जुड़े धार्मिक इतिहास के प्रसंगों को मंदिर की दीवारों पर चित्रकला के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत और अरबी भाषा में मंदिर की शिला पर 616 साल पुरानी तिथि अंकित है। कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान और मेले में आने वाले श्रद्धालु गंगा मंदिर पहुंचते हैं।
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कई पीढ़ियों से मंदिर के पुजारी का दायित्व निभा रहे परिवार के पंडित रामकुमार शर्मा बताते हैं कि श्रीराम आश्रम के संस्थापक रामधारी जी महाराज ने प्राचीन गंगा मंदिर में 20 वर्षो तक तपस्या की थी। वह प्रतिदिन 18 घंटे एक ही पद्मासन में लीन रहते थे। श्री शुकदेव मुनि की तपो भूमि में गंगा मंदिर की अपनी महिमा है।      
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