उन्होंने एमएलए बनने के बाद भी असूल और सादगी को बरकरार रखा। प्राइवेट बस में सवार होकर वह जनता की समस्या सुनने क्षेत्र में आते थे। पूरे जीवन में दो जोड़ी कपड़े ही उनके पास रहे। लखनऊ चार बाग स्टेशन से उतरकर पैदल ही विधायक निवास जाते थे। विधायक होते हुए भी जहां सस्ता भोजन मिलता था, वही ग्रहण कर लेने में काई संकोच नहीं था।
प्रचार के दौरान नंदराम के घर किया था भोजन
चौधरी साहब चुनाव के दौरान अपने समर्थकों संग गांव-गलियारों में पैदल घूमकर प्रचार करते थे। उस जमाने में वोटरों में शराब या घूसखोरी की लत नहीं थी। 1977 में बरला में चुनाव की मीटिंग में चौधरी साहब ने नंदराम को बुलाया और कहा कि आज तुम्हारे यहां भोजन करेंगे। चार घंटे उनके गांव कुतुबपुर में ठहरकर अपनी पत्नी गायत्री देवी के संग बड़े चाव से गरीब के कच्चे मकान में भोजन किया। भले ही नंदराम आज हमारे बीच न हो पर उनकी सादगी, ईमानदारी की मिसाल आज भी महंगे व तड़क फड़क वाले चुनाव के दौरान जरूर चौपालों पर सुनने को मिलती हैं। उन्होंने अंतिम वक्त तक सादगी का साथ नहीं छोड़ा।
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