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राजनीति में मिसाल बने वर्मा के आदर्श

Mon, 19 Sep 2016 12:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
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program - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मुजफ्फरनगर। आजादी के बाद जिले की सियासत में वीरेंद्र वर्मा ने ऊंचाईयों को छूने के साथ अपने आदर्शों की मिसाल कायम की। चौधरी चरण सिंह के विराट व्यक्तित्व के आगे उन्होंने अपना अलग मुकाम बनाया। ग्रामीण विकास को नई दिशा देते हुए वर्मा ने कृषि, सिंचाई और सहकारिता क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए।
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सेवा की प्रेरणा वीरेंद्र वर्मा को अपने ताऊ चौधरी मामराज सिंह से मिली। आर्य समाज और महर्षि दयानंद से प्रेरित होकर उन्होंने विद्यार्थी जीवन में ही महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भागेदारी निभाई। वर्ष 1945 में वह राजनीति में सक्रिय हो गए। पहली बार वे जिला कांग्रेस कमेटी में महामंत्री और फिर अध्यक्ष चुने गए।

मुजफ्फरनगर और शामली के गांवों के विकास में उनकी अहम सहभागिता रही। पांच बार विधायक बने वर्मा को पहली बार वर्ष 1959 में सूबे में उप सहकारिता मंत्री बनने का मौका मिला। फिर उन्होंने कई विभागों में कैबिनेट मंत्री का दायित्व निभाया। किसानों के नलकूपों को पॉवर के हिसाब से बिजली बिल अदा करने, गांव में सड़के और नहर की पटरी बनवाने, चकों के आधार पर सिंचाई के लिए ओसराबंदी, कुलावा तब्दीली की सहूलियत दिलाने, बिडौली में यमुना पर बांध बनवाने, चीनी मिलों की स्थापना आदि क्षेत्रों में उनका अहम योगदान रहा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर वीपी सिंह तक उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे।
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 चौधरी चरण सिंह ने 1984 में उन्हें राज्य सभा सांसद बनाया और सदन में लोकदल का नेता घोषित किया। हालांकि सियासी तौर पर बड़े चौधरी और उनके बीच गिले शिकवे भी खूब रहे, लेकिन एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव हमेशा रहा। 

लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहने के बावजूद चौधरी साहब ने वर्मा को राज्य सभा भेजा। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल सिंह ने उन्हें आतंक से जूझते पंजाब का राज्यपाल बनाया। राजनीति में अपनी बेदाग छवि और भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुखरता को लेकर वर्मा ने देश की संसद में अलग पहचान बनाई।  

वहीं लखनऊ हो या दिल्ली, राजनीति में वीरेंद्र वर्मा जिस पद पर भी रहे, वह अपने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को पोस्टकार्ड लिखते थे। जिले में कार्यक्रम से पूर्व उनकी चिट्ठी पहुंच जाती थी। शहर में अंसारी रोड पर उनका आशियाना था, जहां किसानों और राजनीतिज्ञों की सभा जमती थी। यदि कोई नहीं पहुंचता, तब वर्मा टेलीफोन कर पूछते थे, क्या मेरी चिट्ठी नहीं मिली? उनके हाथ से लिखी  चिट्ठी ही उनकी संपर्क शक्ति का आधार थी।

पूर्व राज्यपाल का जन्म शताब्दी समारोह मनाया
मुजफ्फरनगर। पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा की सौवीं जयंती पर गांव, किसान और मजदूर की उन्नति के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों का स्मरण किया गया। वक्ताओं ने कहा कि आजादी के बाद ग्रामीण विकास में वर्मा का योगदान भूलाया नहीं जा सकता। गांधी कालोनी स्थित वीरेंद्र वर्मा पार्क के भवन में आयोजित जन्म शताब्दी समारोह में वैदिक रीति से यज्ञ में आहुतियां अर्पित कर वर्मा को श्रद्धांजलि दी गई। आचार्य गुरुदत्त आर्य ने कहा कि वर्मा का जीवन ईमानदारी का प्रतीक था।

सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए उन्होंने आर्य समाज के समाज सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।  युवाओं में शराब बंदी के लिए चेतना जगाई। वीरेंद्र वर्मा विचार मंच के संयोजक उमा दत्त शर्मा ने कहा कि वर्तमान राजनीति में वर्मा जी जैसे स्वच्छ छवि के व्यक्तित्व की कमी दिखती है। संस्था अध्यक्ष देवी सिंह सिंभालका ने कहा कि उनके आदर्श, उपलब्धियां और कार्य अतुलनीय है। श्री भगवान शर्मा, चंद्रवीर सिंह, विजय कुमार, सुक्रमपाल, रामचंद्र सिंह, रामपाल वर्मा, प्रमोद मंदोड़,        सेवाराम, सुंदरपाल सिंह, रामपाल, राजपाल सिंह आदि ने विचार रखे।  कार्यक्रम में भोपाल सिंह, कस्तूर सिंह स्नेही, योगेंद्र सिंह, कल्याण सिंह, वेदप्रकाश, नरेंद्र राठी, राजपाल राठी, विजय कुश, अनूप सिंह वर्मा, डॉ. जीत सिंह तोमर, जगदीश बालियान आदि मौजूद रहे। यज्ञमान का दायित्व युद्घवीर सिंह और जगदीश अरोरा ने निभाया।

राजनीति में ऊंचाइयों पर चमके वर्मा
शामली में 18 सितंबर 1916 को जन्मे वीरेंद्र वर्मा उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा के सदस्य चुने गए थे। चौधरी रघुवीर सिंह और कौशल्या देवी के पुत्र वर्मा ने मेरठ कॉलेज से बीए और एलएलबी की।

हॉकी खिलाड़ी रहे वर्मा छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गए। वर्ष 1948 में मुजफ्फरनगर जिला परिषद के अध्यक्ष बने। वर्ष 1952 और 1957 में कैराना, 1967 में कांधला,  1969 में खतौली और 1974 में बघरा से विधायक रहे। वर्ष 1984 में वह राज्य सभा सांसद बने। उन्हें 1990 में पुन: राज्य सभा सांसद चुना गया।

14 जून 1990 को पंजाब के राज्यपाल नियुक्त हुए। बाद में  उन्होंने हिमाचल प्रदेश के गवर्नर का दायित्व भी निभाया। 1998 में वर्मा ने कैराना लोकसभा क्षेत्र से भाजपा टिकट पर सांसद का चुनाव जीता। उन्होंने प्रदेश में सिंचाई, ऊर्जा, उद्योग, श्रम, शिक्षा और गृह विभाग के कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी भी निभाई। वेस्ट यूपी में चौधरी चरण सिंह के साथ उनकी गिनती शीर्ष किसान राजनीतिज्ञ में होती थी। 2 मई 2008 को शामली में वर्मा का देहावसान हुआ।
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