मुजफ्फरनगर। आखिरकार अखाडे़ में दादा राजेंद्र की मेहनत रंग लाई। पौत्री दिव्या को जो दांवपेंच सिखाते हुए दादा ने सपना देखा था, जो शुक्रवार को पूरा हो गया। पुरबालियान का सैन परिवार तीन पीढ़ियों अखाडे़ की मिट्टी से जुड़ा है। दिव्या के दादा राजेंद्र पहलवान ने सबसे पहले अखाडे़ से नाता जोड़ा था। खेती-बाड़ी नहीं होने के कारण राजेंद्र ने मंसूरपुर शुगर मिल में छोटी की नौकरी करते हुए जहां परिवार का पालन पोषण किया, वहीं अपनी कुश्ती का शौक भी पूरा किया। राजेंद्र पहलवान ने पूरी जवानी अखाडे़ में लगा दी और कई इनामी दंगल जीते। उम्र बढ़ने पर बड़े बेटे सूरजवीर का कुश्ती के गुर सिखाए और उसे भी अखाडे़ में उतार दिया। सूरजवीर ने भी कुश्ती में नाम कमाया।
दादा और पिता को अखाडे में कुश्ती लड़ते देख कर छोटी उम्र में ही दिव्या का मोह भी अखाडे़ से हो गया था। पौत्री का कुश्ती से लगाव देख कर दादा राजेंद्र ने तीसरी पीढ़ी के रुप में उसे अखाडे़ में उतारा और कुश्ती के दांवपेंच की हर बारीकी उसे समझाई। दादा ने अखाडे़ में दिव्या से खूब पसीना बहाना सिखाया।
उसे दिल्ली ले जाकर स्वयं अपनी देखरेख में उसे नया हौसला दिया। आखिरकार दादा की मेहनत रंग लाई। दादा राजेंद्र पौत्री की उपलब्धि से गदगद है। कहते है कि दिव्या ने देश के लिए पदक जीत कर परिवार समेत गांव और जिले का नाम रोशन किया है। हमें दिव्या की कामयाबी पर गर्व है।
दंगल में छोरों को किया चित
दिव्या ने जब अखाडे़ की मिट्टी से नाता जोड़ा तो अखाडे की ही होकर रह गई। उसने दंगलों में युवकों के साथ भी कुश्ती की। युवकों के साथ दंगल में कुश्ती लड़ने की आलोचना भी हुई, मगर परिजनों और दिव्या ने इसे नजर अंदाज कर दिया। दिव्या नित नए मुकाम हासिल करती चली गई।
अब ओलंपिक पर नजर
दिव्या के पिता सूरजवीर का कहना है कि बेटी से गोल्ड या रजत पदक जीतने की आशा था। फिर भी उसने देश के लिए कांस्य पदक जीत कर आस्ट्रेलिया मेें तिरंगा फहराया है। दिव्या जूनियर थी, जबकि बाकी पहलवान सीनियर थी। नाईजीरिया की पहलवान ओलंपियन चैंपियन है, जिससे दिव्या हारी है। अब बेटी की निगाहें ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतने पर रहेगी।
पुरबालियान का मस्तक हुआ ऊंचा
मुजफ्फरनगर।गोल्ड कोस्ट में कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला पहलवान दिव्या काकरान ने देश के लिए कांस्य पदक जीतकर देश और अपने गांव का नाम रोशन कर दिया। उसकी इस कामयाबी पर गांव पुरबालियान में जश्न का माहौल है। परिजनों को बधाई देने वालों का तांता लगा है।
गोल्ड कोस्ट में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में कुश्ती में दिव्या काकरान यूपी की अकेली पहलवान हैं। उसके मुकाबले पर पूरे जिले की निगाहें लगी थीं। दिव्या की पहली कुश्ती केमरुन की पहलवान से हुई, जिसे दिव्या ने जीत लिया। दूसरे मुकाबले में नाईजीरिया की ओलंपियन विजेता पहलवान से प्वाइंटों के आधार पर हार गई। जिस कारण वह गोल्ड और रजत पदक की दौड़ में पिछड़ गई। इसके बाद तीसरा मुकाबला बांग्लादेश की पहलवान सुल्ताना से हुआ। दिव्या ने चंद मिनटों में ही विरोधी पहलवान को चित कर देश के लिए कांस्य पदक जीत लिया। जिसके बाद गांव पुरबालियान में परिजनों ने ग्रामीणों को मिठाई बांट कर अपने खुशी का इजहार किया। ग्रामीणों ने बताया कि दिव्या के आस्ट्रेलिया से लौटने पर भव्य स्वागत किया जाएगा। दिव्या सीसीएसयू मेरठ कैंपस की बीपीईएस तृतीय वर्ष की छात्रा है।
अब बेटी के आस्ट्रेलिया से लौटने का इंतजार
दादा राजेंद्र सिंह ने मिठाई बांट कर पौत्री की उपलब्धि पर खुशी का इजहार किया। माता-पिता समेत सभी परिजन चार दिन पहले ही गांव आ गए थे। गांव में देवी देवताओं की पूजा अर्चना कर बेटी की सफलता की प्रार्थना की गई। छोटे से घर पर ग्रामीणों की बैठक हर रोज लग रही थी। सभी दिव्या के प्रदर्शन को लेकर चर्चा कर रहे थे।
शुक्रवार सुबह दिव्या के मुकाबले हुए तो सभी टीवी से चिपक पर बैठ गए। केमरुन की पहलवान को पहले मुकाबले में हरा कर दिव्या ने पदक के लिए पहला पायदान पार किया। नाईजीरिया की पहलवान से प्वाइंटों के आधार पर हारने पर परिजन और ग्रामीण कुछ मायूस हो गए थे, मगर उन्हे दिव्या के हौसले पर पूरा विश्वास था। तीसरा मुकाबला जीतते ही दिव्या ने कांस्य पदक हासिल किया तो पूरा गांव खुशी से झूम उठा। दादी प्रेमवती, चाचा मोहनवीर, चाची शर्मिष्ठा, भाई देव सैन, दीपक, तनिष्क, निशांत, बहन निशा, काजल की खुशी देखते ही बनती थी। विक्रम सिंह, अजब सिंह, महेंद्र सिंह, कलीराम, रुढे सिंह, राकेश, धर्मवीर, राजवीर आदि ग्रामीणों ने बताया कि बेटी ने पूरे गांव का सपना पूरा कर दिया है। अब उसके आस्ट्रेलिया से लौटने का इंतजार है। बैंडबाजों के साथ उनका स्वागत करने की तैयारी कर दी है।