मोरना। शुक्रताल स्थित श्री विश्वकर्मा धर्मशाला में आयोजित भागवत कथा में पलवल हरियाणा से पधारे स्वामी हरितीर्थ महाराज ने कहा कि भक्ति ज्ञान-वैराग्य की जननी है। पुस्तक पढ़ने से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। ज्ञान को उत्पन्न मत करो, ज्ञान को भक्ति से प्रकट करो। भक्ति मां है और ज्ञान-वैराग्य दो बालक है। जहां मां जाती है, मां के पीछे-पीछे बालक दौड़ता चला आता है।
उन्होंने बताया कि भक्ति से जो ज्ञान प्रकट हुआ है, वह ज्ञान हमेशा कायम रहता है। प्रयत्न से ज्ञान मिलता है, वह मानव भूल जाता है। इस संसार में कोई जीव का मूर्ख नहीं है। जीव ईश्वर का अंश है। जो जीव ईश्वर का अंश है, वह मूर्ख कैसे हो सकता है। किसी भी जीव का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। पत्थर में मूर्ति होती है वह हमें नहीं दिखाई देती है, कारीगरों को दिखती है। कारीगर की सूक्ष्म दृष्टि होती है। कारीगर पत्थर में मूर्ति को उत्पन्न करता है। भक्ति में जो विघ्न करे, उसको त्याग करो। सज्जन-दुर्जन, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म सभी के आधार भगवान हैं।
जिस भक्ति में धर्म का साथ नहीं होता, वह भक्ति भगवान को प्रिय नहीं होती। मानव भक्ति तो करता है, किंतु मानव प्राय: दुख में ही भक्ति करता है। मानव को जब सुख मिलता है, तब वह भगवान को भूल जाता है। भक्ति में ज्ञान वैराग्य का साथ होना चाहिए। ज्ञान-वैराग्य के बिना भक्ति टिकती नहीं। पाप को भोगना ही पड़ता है, पाप का नाश भोग से ही होता है।
संत बहुत सा पुण्य करते हैं और भगवान को अर्पण कर देते हैं। पुण्य का फल है सुख। जीव अति सुख भोगता है तो सुख भोगने के समय में पाप हो जाता है। इसलिए संत पुण्य का फल भोगते नहीं है। कथा के आयोजन में जयचंद्र भदोरिया इटावा, सरला बुआजी, संदीप राणा आदि मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। कथा को सुनने के लिए हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, अलवर, फरीदाबाद जट्टारी, सूरत गुजरात, रामगढ़, मथुरा आदि से आए श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।