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साढ़े पांच साल में पिछड़ता गया कवाल

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गांव के इंटर कॉलेज में शुरू नहीं हो सकी कक्षाएं
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मुजफ्फरनगर। हत्याकांड और सांप्रदायिक दंगे के बाद कवाल पूरे देश की राजनीति की धुरी बन गया। महीनों तक हाकिमों और सियासतदानों का यहां जमघट लगा रहा, लेकिन फिर किसी ने पलटकर नहीं देखा। गांव के लोग कहते हैं कि चुनाव के बाद हर किसी ने मुंह मोड़ लिया। बीते साढ़े पांच साल में कवाल विकास के लिए तरस गए। स्वास्थ्य और सरकारी शिक्षा को लेकर गांव का बुरा हाल है।
27 अगस्त 2013 को हुए कवाल कांड के बाद मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस गया था। लोकसभा चुनाव से पहले हुए दंगे ने पूरे देश की राजनीति की काया पलट दी, लेकिन करीब 20 हजार की आबादी वाले गांव कवाल में कोई बदलाव नहीं आया। ग्राम प्रधान का चुनाव लड़े साजिद आबिद का कहना है कि गांव के लिए सरकारी अस्पताल स्वीकृत हुआ था, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई। इसलिए वह सिखेड़ा में बन गया। जीतने के बाद सांसद भारतेंद्र सिंह कवाल का रुख नहीं किया। मीरापुर से तत्कालीन बसपा विधायक मौलाना जमील ने भी गांव में काम नहीं कराए थे। कवाल कांड से पहले राजकीय इंटर कॉलेज स्वीकृत हुआ था। उसका निर्माण तो हो गया, लेकिन शिक्षकों की तैनाती आज तक नहीं हो सकी। यहां के छात्र-छात्राएं जानसठ, मुजफ्फरनगर, नंगला मंदौड़ के कॉलेजों में पढ़ने जाते हैं। आफताब आलम कहते हैं कि गांव को चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की जरूरत है। पूर्व प्रधान महेंद्र सैनी कहते हैं कि गांव में तीन पेयजल परियोजनाएं हैं, लेकिन एक भी संचालित नहीं है। गांव में कई सड़कें बनी हैं, लेकिन कोई बड़ा काम नहीं हुआ है।
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कवाल से जुदा हो गई मलिकपुरा की राह
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड के बाद मलिकपुरा की राह अलग हो गई। इस मजरे के लोगों ने सुरक्षा के मद्देनजर अपने लिए अलग रास्ता बनवाने की मांग की तो कवाल से कुछ दूर पहले गांव के बाहर को करीब ढाई किलोमीटर लंबी सड़क बनवा दी गई। मलिकपुरा मजरा कवाल ग्राम पंचायत का ही गांव है। दोनों के बीच करीब ढाई किलोमीटर की दूरी है। सचिन और गौरव की हत्या से पहले मलिकपुरा के लोगों का आवागमन कवाल के बीच से था। घटना के बाद पैदा हुई तल्खियों ने अलग रास्ते बनवा दिए। अब मलिकपुरा के बहुत कम लोग ही कवाल से होकर गुजरते हैं।
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