मुजफ्फरनगर। तेजलहेड़ा गांव से पांच लाख की फिरौती के लिए लकड़ी ठेकेदार सालिम की छुरी से गर्दन काटकर हत्या के मामले में 27 साल बाद अभियुक्त शाहनवाज पर दोष सिद्ध हुआ है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने सजा पर सुनवाई के लिए 12 अगस्त नियत की है। यूपी और उत्तराखंड की सीमा पर 48 दिनों तक अपहरण, फिरौती और हत्या की वारदात अंजाम दी गई।
छपार के तेजलहेड़ा गांव निवासी आबाद, हारुण और मुकर्रम नौ दिसंबर 1999 की रात करीब आठ बजे ट्रैक्टर-ट्रॉली में पॉपलर की लकड़ियां लादकर हरियाणा के यमुनानगर बेचने के लिए निकले थे। रजबहा पटरी पर पहुंचते ही तीन बदमाशों ने तमंचे से डराते हुए घेर लिया। आबाद किसी तरह बचकर भाग निकला, जबकि हारुण और मुकर्रम का अपहरण कर लिया गया था।
वादी आबाद ने प्राथमिकी दर्ज कराई। दो दिन बाद मुकर्रम को बदमाशों ने छोड़ दिया और हारुण के पिता सालिम को पांच लाख रुपये की रंगदारी के लिए चिट्ठी भेजी। मामले में नया मोड़ 19 जनवरी 2000 को आया। सालिम अपने परिवार के इलियास के साथ बदमाशों से मिलने लक्सर के पास जंगल में पहुंचे।
बदमाशों ने उनकी मुलाकात हारुण से कराई। रुपयों का इंतजाम करने के लिए बदमाशों ने हारुण को छोड़ दिया और सालिम एवं इलियास को अपहरण कर बैठा लिया। फिरौती की रकम का इंतजार करने के बाद बदमाशों ने 25 जनवरी 2000 को सालिम की छुरी से गर्दन काटकर हत्या कर दी और शव को लक्सर के जंगल में फेंक दिया था।
करीब 25 दिन बाद 50 हजार रुपये की फिरौती वसूलकर इलियास को छोड़ा गया था। पुलिस जांच में बरला के सगे भाई शाहनवाज व शौकीन के अलावा भोकरहेड़ी के अहसान का नाम प्रकाश में आया। शौकीन और अहसान पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। शाहनवाज के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। बुधवार को मामले में अदालत ने सुनवाई करते हुए शाहनवाज पर दोष सिद्ध किया।
दो राज्यों की सीमा पर 48 दिन भटके बदमाश
मुजफ्फरनगर। बदमाशों ने तेजलहेड़ा के जंगल से हारुण और मुकर्रम का अपहरण किया लेकिन इसके बाद वह सीकरी और भोकरहेड़ी के जंगल में भटक गए। मुकर्रम को छोड़ दिया गया। हारुण को लेकर लक्सर के सुल्तानपुर के जंगल में पहुंचे और यहीं पर एक ठिकाना बनाकर करीब 47 दिन तक घटनाक्रम चलता रहा। सालिम की हत्या के बाद करीब 25 दिन बदमाशों ने इलियास को यहीं पर रखा था। ब्यूरो
सालिम हत्याकांड में कब क्या हुआ
- 09 दिसंबर 1999 : हारुण व मुकर्रम का अपहरण।
- 11 दिसंबर 1999 : मुकर्रम बदमाशों से छूटकर लौटा।
- 15 दिसंबर 1999 : पांच लाख की रंगदारी की चिट्ठी।
- 19 जनवरी 2000 : बदमाशों ने हारुण को छोड़ा। सालिम-इलियास पकड़ा।
- 25 जनवरी 2000 : लक्सर में लाश मिलने की सूचना।
- 26 जनवरी 2000 : शव सालिम का निकला।
चिट्ठी भेजी, एसटीडी से की थी कॉल
बदमाशों ने पांच लाख की फिरौती के लिए पहले चिट्ठी भेजी और इसके बाद एसटीडी से भी गांव में दो बार कॉल की थी। पीड़ित परिवार को मिलने के लिए जंगल में बुलाया।
इस तरह छूटा बेटा...फंस गया पिता
मुजफ्फरनगर। ठेकेदार हारुण के अपहरण के मामले में पुलिस को सफलता नहीं मिली। फिरौती की चिट्ठी मिली तो पिता ठेकेदार सालिम, परिवार के इलियास और मुश्ताक के साथ ट्रैक्टर पर सवार होकर बदमाशों के बताए गए स्थान लक्सर के पास लाठ के जंगल में पहुंच गए। यहां बदमाशों से मुलाकात हुई। सालिम ने कहा कि गारंटी के तौर पर वह और इलियास उनके पास रहेंगे, जबकि हारुण घर जाकर रुपयों का इंतजाम करेगा। हारुण घर लौट आया और सालिम व इलियास बदमाशों के पास रह गए थे। समय पर रकम नहीं पहुंची तो सालिम की हत्या कर दी गई।
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हम कभी नहीं भूल पाएंगे वो दिन
तेजलहेड़ा निवासी वादी आबिद ने कहा कि परिवार उस दिन को कभी नहीं भूल पाएगा। अपहरण तो एक दिन हुआ था लेकिन पूरा घटनाक्रम करीब ढाई महीने चलता रहा। इंसाफ के लिए परिवार ने लंबा इंतजार किया है।
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अदालत ने तलब किया आपराधिक इतिहास
छपार क्षेत्र के बरला के शाहनवाज पर दोष सिद्ध करते हुए अदालत ने उसका आपराधिक इतिहास तलब किया है। सहायक शासकीय अधिवक्ता कुलदीप कुमार को आदेश दिए कि 12 अगस्त तक क्राइम हिस्ट्री पेश की जाए। दोषी और उसके साथियों पर नब्बे के दशक में कई जघन्य हत्याएं अंजाम देने का आरोप लगा है।