मुजफ्फरनगर। राजनीति में धन-कुबेरों का वर्चस्व तोड़कर चौधरी चरणसिंह ने किसानों में अपने हकों के लिए संघर्ष की अलख जलाई थी। किसान की एक नजर खेत की मेड़ पर और दूसरी निगाह दिल्ली की संसद पर होनी चाहिए, पूर्व प्रधानमंत्री का ये संदेश उनकी दूरदृष्टि की मिसाल रहा है। सादगी, ईमानदारी और अथक मेहनत से किसानों के महान नेता बने चौधरी चरण सिंह की 118 वीं जयंती पर उनकी यादें और बातें आज भी नहीं भूलती हैं।
नए कृषि कानूनों के विरोध में कई राज्यों का किसान दिल्ली की सीमा पर बीते एक पखवाड़े से आंदोलन पर अडिग है। ऐसे में किसान मसीहा की याद आती है, क्योंकि किसानों को राजनीति में नेतृत्व ताकत दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही थी। खेती-किसानी, गांव-गरीब और खेत- खलिहान को लेकर उनका गहरा चिंतन था। पूर्व मंत्री धर्मवीर सिंह बालियान कहते हैं कि किसान और मजदूरों के हितों के लिए चौधरी साहब के किए कार्य कोई नहीं भूलता है। फिलहाल परेशान किसान सर्दी में सड़कों पर रात गुजारने को मजबूर है।
पूर्व राज्यसभा सांसद हरेंद्र मलिक कहते हैं कि चौधरी साहब का व्यक्तित्व दुर्लभ था। वे गरीबों और किसानों की चिंता करते थे। वर्तमान में दिल्ली की सत्ता ने किसानों से कोई हमदर्दी नहीं दिखाई है। उन्होंने किसानों को एकजुटता और संघर्ष की जो सीख दी थी, उसी के दम से अन्नदाता ने कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रखी है।
रालोद के पूर्व जिलाध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता राममेहर राठी बताते हैं कि बड़े चौधरी ग्रामीण भारत की उन्नति के प्रबल पैरोकार थे। उन्होंने किसान राजनीति को नई ऊंचाई दी। उनकी राजनीतिक विचारधारा बेहद समृद्ध थी। वर्ष 1983 में शामली के हनुमान धाम में लोकदल का तीन दिवसीय कार्यकर्ता सम्मेलन था, जिसमें उन्होंने सादगी और ईमानदारी से आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। खुद कार्यकर्ताओं के बीच बैठकर खाना खाया। रालोद के पूर्व जिलाध्यक्ष श्रीराम तोमर कहते हैं कि चौधरी साहब ने कभी जाति का भेदभाव नहीं किया। हिंदू और मुस्लिमों को साथ जोड़कर सामाजिक उत्थान के पक्षधर थे। उनकी सरपरस्ती में हर जाति और वर्ग के नेताओं को विधायक तथा सांसद बनने के मौके मिले। वो नि:संकोच अपनी सभाओं में कहते थे, जो प्रत्याशी, किसान और गरीब का भला करने वाला लगे उसे वोट दे।
किसान मसीहा ने वीतराग स्वामी कल्याणदेव को दी थी ‘शिक्षा ऋषि’ की उपाधि
भोपा। मुख्यमंत्री के तौर पर 11 दिसंबर, 1967 को चौधरी चरण सिंह भोपा पधारे थे। वीतराग स्वामी कल्याणदेव के प्रति किसान मसीहा की अगाध श्रद्धा थी। भोपा के जनता इंटर कॉलेज में हुई जनसभा में उन्होंने जहां शिक्षा के प्रोत्साहन को प्रेरित किया, वहीं किसानों से खेती को केवल साधन मानकर बच्चों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया था। भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज बताते हैं कि चौधरी साहब ने पहली बार भोपा में ही गुरुदेव को शिक्षा ऋषि का नाम दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में वह 23 मार्च, 1981 को पुन: भोपा कॉलेज में आए थे। वीतराग संत के आग्रह पर उन्होंने शहर में रेलवे लाइन के पास समाज कल्याण विभाग की अनुदान राशि से एससी छात्रावास का निर्माण कराया था। किसान मसीहा के लिखे पत्रों में उनका शिक्षा ऋषि से आत्मीय स्नेह दिखता है। यह पत्र शुकदेव आश्रम, शुकतीर्थ के संग्रहालय में शोभायमान है।
‘आम’ को ‘खास’ बना देते थे चौधरी साहब
चरथावल। चौधरी चरण सिंह आम कार्यकर्ता को टिकट देकर प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने 1974 और 1984 में भजनोपदेशक नंदराम को चरथावल सुरक्षित सीट से एमएलए बनवाया। सुरक्षित जानसठ सीट से कबूल सिंह, मनफूल सिंह को विधायक बनने का मौका भी चौधरी साहब ने दिया।
हाथी पर बैठकर शाहपुर आए थे चौधरी साहब
शाहपुर। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कस्बे में इलम चंद आर्य के घर कई बार आए थे। स्वर्गीय इलम चंद आर्य के पुत्र डा. सत्यवीर आर्य बताते हैं कि उनके पिता और बड़े चौधरी साहब के बीच गहरी मित्रता थी। वो जब भी क्षेत्र में आए तो उनके आवास पर जरूर पहुंचें। एक बार गांव काकड़ा से चौधरी साहब को हाथी पर बैठाकर कस्बे में लाए थे। यहां उन्होंने बड़ी जनसभा को संबोधित किया था। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री गांव सोरम में आए थे।