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संवेदनाओं से जुड़ा साहित्य ही दीर्घकालिक: डॉ तनेजा 

Thu, 22 Feb 2018 11:54 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/मुजफ्फरनगर
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कार्यक्रम में मौजूद सीसीएसयू के कुलपति डॉ.तनेजा। - फोटो : अमर उजाला
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चौधरी चरणसिंह यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ एमके तनेजा ने कहा कि संवेदनाओं से जुड़ा साहित्य ही दीर्घकाल तक अपनी छाप छोड़ता है। जैन कन्या पाठशाला पीजी कॉलेज में हिंदी, संस्कृत एवं अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार में उन्होंने कहा कि साहित्य स्वांत सुखाय के लिए नहीं मानव कल्याण को समर्पित होता है। 
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सेमिनार का विषय था साहित्य: मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुलपति ने कहा कि साहित्य संपूर्ण मानवता की समस्याओं का हल प्रस्तुत करता है। दीर्घकाल तक वही साहित्य चलता है, जो समाज की समस्याओं को रखते हुए उनका निराकरण देता है।

मेरठ में हजारों जासूसी उपन्यास छपे पर किसी का भी दूसरा एडिशन प्रकाशित नहीं हुआ। प्रेमचंद और इंग्लैंड के चार्ल्स डिकिन के साहित्य की आज भी बराबर डिमांड है। इनके प्रकाशन लगातार छप रहे हैं। साहित्य का दीर्घकालिक महत्व है। रामचरितमानस हमें समाज में हमारी जिम्मेदारी बताती है।
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खोज में सामने आया है कि हर चौपाई में विज्ञान की व्याख्या है। उन्होंने छात्राओं से कहा कि वह अपनी कल्पनाशीलता को बढ़ाएं। लिखने के लिए समझ विकसित करें। एसडी कॉलेज संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ उमाकांत शुक्ल ने कहा कि संस्कृत में साहित्य रस प्रधान है। भाव पर अधिक जोर दिया गया है। तकनीकी युग में संवेदनाओं का क्षरण हुआ है।

 गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर श्रवण कुमार शर्मा ने कहा कि बिना संवेदनाओं के साहित्य की कल्पना ही व्यर्थ है। आईआईटी रुड़की से आए पशुपति झा ने कहा कि मानवीय संवेदनाओं को उकेरने वाला साहित्य ही आम जनमानस को प्रभावित करता है।

प्रेमचंद पर शोध कर रहे साहित्यकार डॉ प्रदीप कुमार जैन ने कहा कि साहित्य में प्रेमचंद की रचनाएं इसलिए अमर हैं कि उन्होंने आम आदमी की पीड़ा, उसके सुख-दुख को अपने साहित्य में स्थान दिया। निर्मला, गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि उनकी अमर रचनाएं हैं। विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष मनोरमा त्रिखा ने कहा कि सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार ही साहित्य सृजन होता है, लेकिन संवेदनाएं सर्वोपरि होती हैं।

एसडी डिग्री कॉलेज हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ विश्वम्भर पांडेय ने कहा कि साहित्य समाज का प्रतिबिंब है, समाज का मार्ग दर्शक और समाज का लेखा जोखा है। साहित्य और समाज का संबंध मानव शरीर और आत्मा की भांति ही है। शरीर तो एक दिन नष्ट हो सकता है, कोई भी राष्ट्र नष्ट हो सकता है, किंतु आत्मा रूपी साहित्य अजर और अमर है।

संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ जयकुमार जैन, एमएमएच कॉलेज गाजियाबाद के हिंदी विभाग से आये डॉ कान्तिबोध, प्रोफेसर जेपी सविता, डॉ अलका बंसल ने साहित्य को समाज का दर्पण बताया। इससे पूर्व प्राचार्य डॉ सीमा जैन ने कुलपति डॉ एमके तनेजा, प्रबंध समिति के अध्यक्ष राजेश जैन, नरेंद्र जैन, देवेंद्र जैन, संजय जैन आदि का स्वागत किया। शुभारंभ मोनिका ने सरस्वती वंदना से किया।

संचालन डॉ पूनम भारद्वाज ने किया। कॉलेज की पत्रिका का कुलपति सहित सभी अतिथियों ने विमोचन किया। आयोजन में डॉ रीता गर्ग, डॉ पूनम भारद्वाज, डॉ रीतू मित्तल, डॉ अंजली शर्मा, डॉ सीता, डॉ वर्चसा सैनी, डॉ निशा गुप्ता, नीता भटनागर, डॉ वंदना वर्मा, डॉ संतोष कुमारी, सोनाली सिंह, प्रतिमा शर्मा, डॉ दुष्यंत, डॉ अमरदीप, डॉ पल्लवी, डॉ अरविन्द, बीना मित्तल, रिचा जैन, पूर्णिमा, पार्वती, डॉ छाया, अंशिका, रीमा, सोनम, आरती, अंजू त्यागी, हिमांशु, मोनिका, अर्चना, निधी, सृष्टि आदि का सहयोग रहा। 
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