पश्चिमी क्षेत्र में किसानों का गन्ने की फसल से मोहभंग हो रहा है। वेस्ट यूपी के किसानों में फूलों के साथ फलों की खेती का भी रुझान बढ़ रहा है। इससे किसानों की आमदनी में इजाफा होने के साथ शुगर मिलों के धक्के खाने से भी निजात मिल गई है। भोकरहेड़ी में किसान केले की खेती कर प्रगतिशील हो रहे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुख्य फसल में गन्ना शुमार है। धीरे-धीरे वेस्ट में गन्ने का रकबा घट रहा है, इसके पीछे किसानों का गन्ने की फसल से मुंह मोड़ लेना है। मोरना क्षेत्र की भोकरहेड़ी नगर पंचायत के मोहल्ला नेहरू चौक निवासी यशपाल पुत्र पीरु के पास 78 बीघा भूमि है। अभी तक यशपाल अपने पुत्रों सुमित और विनय के साथ खेतों में गन्ना उगा रहे थे। बीते चार साल में खेती का स्वरूप बदलने के साथ प्रगति की नई राह भी खोल ली। यशपाल के पुत्र सुमित सहरावत ने पुश्तैनी फसल गन्ने को छोड़कर अब केले की खेती की ओर रुझान किया है। सुमित ने बताया कि वर्तमान में 30 बीघा भूमि में केले की फसल उगा रहा है, जिसमें लागत कम और इनकम में इजाफा अधिक है। गन्ने के मुकाबले केले की फसल में अधिक पैदावार है। सुमित ने बताया कि गन्ना बकाया भुगतान, शुगर मिलों की मनमानी और लागत अधिक, इजाफा कम होने के कारण किसानों ने गन्ना बोना कम कर दिया है।
महाराष्ट्र से सीखी केले की खेती
मोरना। बीए. एलएलबी पास सुमित सहरावत चार साल पहले नौकरी की तलाश में गया था, लेकिन यहां पर खेतों में केले की फसल देखकर मन बदल गया। महाराष्ट्र में ही कृषि वैज्ञानिक केएस सुरेश से केले की खेती की पूरी तकनीक सीखी है। उसके बाद भोकरहेड़ी आकर गन्ने की फसल छोड़कर केले की खेती में रुझान बढ़ा दिया। भोकरहेड़ी का सुमित सहरावत केले की खेती कर प्रगतिशील किसान बन गया है।
खर्च 10 हजार और आमदनी 25 हजार
मोरना। गन्ना की फसल के मुकाबले केले की खेती में खर्च कम है। किसान सुमित सहरावत ने बताया कि केले की प्रति बीघा खेती में दवाइयों, खाद के लिए 10 हजार रुपये का खर्च आता है। जबकि एक बीघा फसल से ही 25 हजार रुपये की आमदनी है। एक बीघा में 25 से 30 क्विंटल केले उगता है, जिसके लिए एक बीघा में 150 पौध लगाई जाती है। पौध को 6-6 फीट की दूरी पर लगाया जाता है। फसल को तैयार होने में करीब 14 माह का समय लगता है। उसके बाद ही फसल बाजार में पहुंचने लायक बनती है।
यह रोग है केले के लिए दुश्मन
मोरना। आम, अमरूद, गन्ना के तरह ही केले में तेजी से कई रोग उत्पन्न होते हैं। बनाना बिटल, जड़ गलन, फंग्स, सूंडी रोग केले को पकने से पहले ही नष्ट कर देता है। इन रोगों को रोकथाम कड़ी है। यदि यह फैल जाएं तो प्रति बीघा में करीब 50 से 75 प्रतिशत फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सरकार हाथ बढ़ाए तो प्रगति करें किसान
मोरना। किसान सुमित सहरावत ने बताया कि किसानों में फल, फूल, सब्जी आदि की खेती करने का रुझान है। हालांकि केंद्र और प्रदेश सरकार सही रूप से किसानों की मदद के लिए हाथ बढ़ाएं तो प्रगति तेजी से संभव है। अपनी तैयार केले की फलस को बेचने के लिए सुमित को दिल्ली की आजादपुर मंडी, शहर की नवीन मंडी पर निर्भर रहना पड़ता है। अन्य प्रदेशों की तरह केंद्र या प्रदेश सरकार यहां भी फल मंडी बना दे तो किसानों को वाजिब दाम मिल सकेगा। हालांकि इसके लिए सुमित ने पूर्व डीएम कौशल राज शर्मा और वर्ष 2016 में केंद्रीय राज्य कृषिमंत्री राधा मोहन को लिखित में पत्र देकर मंडी बनाए जाने की मांग की थी।