आजाद हिंद फौज के सैनिक अमजद हसन (फाइल फोटो)
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
चरथावल। देशभक्ति के जोश और जज्बे से भरे सिर्फ साढ़े 16 साल की उम्र में फौज में शामिल होने वाले वीर सेनानी अमजद हसन की यादें अमिट है। आजाद हिंद फौज में शामिल होकर लंबे समय सुभाष चंद्र बोस के अंगरक्षकों में रहे। अमजद हसन के परिजन बताते हैं कि उन्हें नौ महीने 10 दिन तक इंग्लैंड की जेल (कालकोठरी) में रहकर दो आलू खाकर पूरा दिन बिताना पड़ता था।
चरथावल कस्बे के तगायान मुस्लिम में अहमद हसन-हनीफा खातून दंपती के घर 23 जनवरी 1926 को जन्मे अमजद आजाद में बचपन से देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। युवावस्था में फिरंगी शासकों द्वारा क्रांतिकारियों पर किए जा रहे जुल्म की देखकर उनकी भुजाएं फड़कने लगती थीं। वह सेना से बगावत करते हुए आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए। कालांतर में अमजद हसन को नेेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंगरक्षक बनाया और जर्मनी, इंग्लैंड, इटली एवं मिस्र आदि की यात्रा की। नोएडा निर्वाचन कार्यालय में कार्यरत उनके बेटे अफसर संस्मरण बताते हैं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इटली की यात्रा के दौरान उन्हें दिखाया था कि वहां कोई भीख नहीं मांग रहा है। हिंदुस्तान को भी ऐसा बनाने का जोश भरते थे नेताजी।
लंदन में कालकोठरी की सजा काटी
चरथावल। बगावत पर वह गिरफ्तार कर लिए गए। इंग्लैड़ मिलिट्री ने गिरफ्तार कर लंदन में उन्हें नौ महीने 10 दिन जेल में डाल दिया। वहां दो माह काल कोठरी में बिताए। उनके पुत्र अफसर बताते हैं फिरंगी प्रशासन पूरे दिन में मात्र दो आलू खाने को देता था। रमजान में वह एक आलू सहरी के समय और एक से अफ्तारी कर रोजा खोल लेते थे। तीन महीने बहादुरगढ़ जेल में रहे। जर्मनी के जहाज से मुल्क में आ रहे थे। समुद्र में जहाज डूबने लगा, तो वह हौसले से ऊपरी मंजिल पर चढ़ गए। काफी सैनिक शहीद हो गए। तभी दो जहाज जर्मनी से आए और उन्होंने डूबते जहाज का बचाया। चूंकि जर्मनी में लोहे के दाम सोने से ज्यादा थे, वह अपना जहाज डूबते नहीं देख पाए थे। कई हफ्ते जहाज में सूखी ब्रेड खाकर समय बिताया था।
जेल से छूटने की खबर पर मां का हो गया था इंतकाल
चरथावल। अमजद के पुत्र मशरूर बताते हैं पिता के जेल से छूटने की खबर कस्बे में पहुचीं तो दादी इस खुशी को बर्दाश्त नहीं कर सकी और उनका इंतकाल हो गया था जबकि मां का गत जुलाई 2020 को मेरठ में निधन हो गया। लोकतंत्र सेनानी डा. मुस्तफा उनके संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि अमजद हसन बहादुरगढ़ जेल से छूटकर आए तो उस दौरान प्लेग की बीमारी फैलने से परिवार में बहन और मां ही बचे थे। चरथावल में आकर भी वह युवाओं को राष्ट्रभक्ति के लिए सुभाष चंद्र बोस के सपनों के अमर गीत- चल चल रे नौजवान, रुकना तेरा नाम नहीं..सुनाकर जोश भरते थे। वर्ष 2003 में उनका इंतकाल हो गया था।