- दंगे के बाद सत्ता परिवर्तन का केंद्र बने मुजफ्फरनगर को नहीं छोड़ना चाहती भाजपा
- गठबंधन में मथुरा और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट रालोद को देने से किया इन्कार
अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। भाजपा और रालोद गठबंधन की तस्वीर साफ होने लगी है। अयोध्या में राम मंदिर बन जाने के बाद अब भाजपा की निगाह सियासत के नए केंद्र मथुरा पर है। इसके अलावा दंगे के बाद सत्ता परिवर्तन का केंद्र माने जाने वाले मुजफ्फरनगर को भी लगातार दो चुनाव में जीत के बाद भाजपा हाथ से नहीं जाने देना चाहती। यही वजह है कि रालोद को दोनों ही सीटें देने से इन्कार कर दिया।
बृहस्पतिवार को गठबंधन लगभग तय हो गया। रालोद ने मथुरा, मुजफ्फरनगर, कैराना, बिजनौर और अमरोहा सीट पर दावेदारी की थी। लेकिन भाजपा ने 2019 के चुनाव में हार वाली सीटें ही देने का प्रस्ताव रखा। जबकि बागपत और बिजनौर पर शुरूआत में ही सहमति बन गई थी। तीसरी सीट अमरोहा या कैराना भी रालोद के हिस्से में आ सकती है, हालांकि इस पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है। दोनों दलों में गठबंधन लगभग तय है। मुजफ्फरनगर और मथुरा सीट पर भाजपा चुनाव लड़ेगी, जबकि बागपत और बिजनौर समेत तीन सीटें रालोद को मिलेंगी। एक राज्यसभा और एक एमएलसी भी रालोद के कोटे से बनाए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं।
कार्यकर्ताओं को इंतजार करने का संदेश
रालोद अध्यक्ष जयंत सिंह की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर वह अभी तक चुप हैं। कार्यकर्ताओं को बेचैनी को देखते हुए जिम्मेदार पदाधिकारियों के जरिए अभी इंतजार करने का संदेश दिया गया है। भाजपा और रालोद के बीच अगर गठबंधन हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छपरौली में आने की संभावना है। आचार संहिता लगने से पहले यहां से कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी किसानों के लिए हो सकती हैं।