शामली। बाल दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में बाल संरक्षण के लंबे चौडे़ दावे किए जाते हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई पर जोर देने की वकालत होती है। सरकारी योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी कई बच्चे परिवार और पेट की खातिर मौत का सामान तक बेचने को मजबूर हैं। दो वक्त की रोटी के लिए कई बच्चे खतरनाक करतब दिखाते हैं। बाल दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला ने शहर का दौरा किया तो इस तरह के कई बच्चे मिले।
शहर के गांधी बाजार के निकट एक किशोर अपने गले में लकड़ी का तख्ता लटका कर उस पर चूहे मारने की दवाई बेच रहा था। अमर उजाला टीम उसके पास पहुंची तो वह कुछ सहमा, पूछने पर उसने अपना नाम मारूफ पुत्र नासिर बताया। उसने बताया कि वह शहर के बरखंडी में रहता है। उसके पिता बीमार हैं, घर में उसके तीन छोटे भाई हैं। इनमें से कोई भी स्कूल नहीं जाता। घर का गुजारा नहीं होता, इसलिए भाई भी इधर-उधर पन्नियां या कूड़ा चुगते हैं। किशोर को खुद नहीं पता था कि वह जो बेच रहा है, कितनी घातक है। उसने कहा कि उसे तो बस यही बताया गया कि यह चूहों का चालान है। दिन में 80 से 100 रुपये तक कमा लेता है।
पंसारियान मोहल्ले के निकट सड़क किनारे पड़े कूडे़ के ढेर में पन्नियां बीन रहे पिंटू और सोनू ने बताया कि वे पंसारियान मोहल्ले में ही रहते हैं। पूछने के बाद भी उन्होंने अपने पिता का नाम नहीं बताया और चले गए। शहर के एमएसके रोड पर एक बाइक मैकेनिक की दुकान पर काम करने वाले 13 वर्षीय अश्वनी पुत्र सुधीर ने बताया कि वह दयानंद नगर मोहल्ले में रहता है। उसने बताया कि परिवार बेहद गरीब है, इसलिए काम करता है।
शहर के नाला पटरी पर एक बच्ची हाथ में डंडा लेकर करीब 12 फिट ऊंचाई पर बंधी रस्सी पर चलकर करतब दिखा रही थी। यह खतरनाक खेल देखकर लोग भी हैरान थे। पेट की खातिर यह मासूम खतरनाक खेल दिखाने को मजबूर थी। उसके साथ खेल दिखा रहे लोगों से जब पूछा तो बोले यह तो हमारा पुश्तैनी काम है, ऐसा नहीं करेंगे तो रोटी कहां से खाएंगे। हैरानी की बात यह भी है कि इनमें से किसी भी मासूम बच्चे को यह नहीं पता था कि कल बाल दिवस है।
153 बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाया : डीएम
शामली। जो बच्चे किसी मजबूरी में स्कूल नहीं जा रहे है, ऐसे बच्चों को वह खुद चिह्नित कर उनके परिजनों से बात कर रहे हैं। पिछले डेढ़ महीने में उन्होंने इस तरह के 153 बच्चों के परिजनों से बात कर उनका स्कूल में दाखिला कराया है। वह सरकारी योजनाओं के अलावा सामाजिक संस्थाओं और खुद के निजी प्रयासाें से संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं। इन बच्चों को भी परिजनों से बात कर स्कूल भेजा जाएगा।