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संस्कृति राष्ट्र की आत्मा: सत्यप्रिय

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मुजफ्फरनगर। आचार्य सत्यप्रिय ने कहा कि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा होती है। भारत की संस्कृति वेदों में सन्निहित है और इसी से राष्ट्र का निर्माण होता है। वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम संस्कृति के संवाहक हैैं।
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आर्य समाज नई मंडी के तीन दिवसीय वार्षिक होलिकोत्सव के समापन समारोह में आचार्य सत्यप्रिय ने कहा कि राष्ट्र का निर्माण वैदिक संस्कृति के आधार पर होगा तभी देश का चरित्र सुदृढ़ और उच्चकोटि का बनेगा। संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है इसीलिए वेदों के अनुरूप व्यवस्था आवश्यक है। आचार्य संजीव ने कहा कि वेद विश्व के कल्याण का धर्म ग्रंथ है। आचार्य योगेश ने गुण कर्म और स्वभाव के आधार पर वर्ण व्यवस्था की व्याख्या की। स्वामी सत्यवेश ने कहा कि भगवान बने स्वयंभू ढोंगी बाबाओं से बचें। वैदिक मार्ग पर चलने से संस्कारों से जीवन जुड़ता है। आचार्य गुरुदत्त आर्य ने कहा कि वेदों और साहित्य का स्वाध्याय करने से ही आचरण, नैतिक मूल्य, देश भक्ति और कर्तव्य निष्ठा का बोध होता है। श्रेष्ठ आचरण ही धर्म की कसौटी है। भजनोपदेशक सहदेव सिंह बेधड़क ने ईश्वर भक्ति, देशप्रेम और ऋषि महिमा के भजन सुनाए। स्वामी भजनानंद सरस्वती, स्वामी योगानंद सरस्वती ने प्रवचन किया।
इससे पूर्व वेदमंत्रों से यज्ञ हुआ और ब्रह्मा का दायित्व आचार्य पवनवीर एवं राकेश आर्य ने निभाया। यज्ञमान आर्य वैभव वशिष्ठ, डॉ नरेश आर्य तथा शुभम सिंघल रहे। राजपाल सिंह चाहल, गुलवीर आर्य, आनंदपाल आर्य, सोमपाल सिंह, मंगत सिंह, केपी सिंह आर्य, सोमदत्त जिज्ञासु, कुंवर सुखपाल आर्य, सत्यप्रकाश बंसल, देवीसिंह आर्य, आरपी शर्मा, मंजू आर्य, प्रियंका आर्य, राजेंद्र माथुर, कर्ण सिंह आदि मौजूद रहे। वैद्य लीलापति शर्मा अतिथियों को च्यवनप्राश भेंट किया। संचालन कृपा शंकर शर्मा ने किया।
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