शुक्रताल (मुजफ्फरनगर)। ऐतिहासिक सरस्वती नदी की खोज में कांची कामकोटि मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती की अहम भूमिका रही। कुरुक्षेत्र में आठ साल पहले सरस्वती नदी पर हुए अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में जगदगुरु के साथ भागवतपीठ शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती ने देश के भूवैज्ञानिकों और पुरातत्व विशेषज्ञों से विस्तृत संवाद किया था। शंकराचार्य के ब्रह्मलीन होने पर शुकतीर्थ के संतों, महात्माओं ने शोक जताया है।
कांची कामकोटि पीठ के 69वें मठ प्रमुख जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती का बुधवार को चेन्नई में देहावसान हो गया। उत्तर भारत की विलुप्त सरस्वती नदी की खोज में उन्होंने अथक प्रयास किए थे। वीतराग स्वामी कल्याणदेव ने वर्ष 1965 में हरियाणा प्रांत की सरस्वती नदी की खोज के अभियान को गति दी थी। जगद्गुरु जयेंद्र सरस्वती ने केंद्र सरकारों के समक्ष प्रमुखता से बात रखी थी। स्वामी ओमानंद सरस्वती बताते हैं कि दिसंबर वर्ष 2009 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में एक अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया, जिसमें जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने वेदों, उपनिषद के माध्यम से विलुप्त सरस्वती नदी का रहस्य बताया था। संतों की पुरातत्व, भूगर्भ और उपग्रह वैज्ञानिकों से चर्चा के बाद अभियान को सक्रियता मिली। अंतत: 2015 में देश के वैज्ञानिकों ने सरस्वती नदी के अस्तित्व को ढूंढ लिया। भागवत पीठ शुक्रताल से सरस्वती नदी का पौराणिक जुड़ाव है, क्योंकि भगवान वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत जैसा अमर साहित्य ब्रह्मनदी सरस्वती के तट पर लिखा था। शंकराचार्य शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में वीतराग स्वामी कल्याणदेव की निष्काम सेवा की प्रशंसा करते थे।
दंडी आश्रम संचालक स्वामी गुरुदत्त महाराज ने कहा कि शंकराचार्य ने देश के अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और उत्तराखंड सहित देशभर में उनकी वेद पाठशालाएं चलती है। हनुमतधाम के अधिष्ठाता स्वामी केशवानंद महाराज ने कहा कि वर्ष 1998 में मानसरोवर और कैलाश की यात्रा कर वहां आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित की थी। महाशक्ति सिद्धपीठ की संस्थापिका माता राजनंदेश्वरी ने कहा कि शंकराचार्य ने पूरे देश का भ्रमण कर हिंदू संस्कृति का गौरव अलौकिक किया।
शुक्रताल दंडी आश्रम में आए थे शंकराचार्य
मोरना। ढाई दशक पहले शुक्रताल के दंडी आश्रम में शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती पधारे थे। भागवत प्रवक्ता विष्णुुु आश्रम महाराज से उनकी भेंट हुई थी। अक्षय वट के दर्शन और शुकदेव मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ उन्होंने गऊशालाओं का भ्रमण किया था। सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन और अमित जैन ने कहा कि सनातन संस्कृतियों के संरक्षण, जीर्णोद्घार और नवनिर्माण में शंकराचार्य के कार्य अमिट हैं।