खतौली में साल के शुरूआत से ही टीबी के मरीजों का आंकड़ा बढ़ना शुरू हो गया है। सरकारी अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी और फरवरी के 37 दिनों में जांच के बाद टीबी के 34 मरीज मिले हैं। वर्ष 2017 में यह आंकड़ा कुल 235 ही था, जिनका अब तक इलाज चल रहा है।
टीबी एक ऐसी भयंकर बीमारी है, अगर यह किसी को हो जाए तो परिवार के लोग भी उससे दूरी बनाने लगते हैं। यह छुआछूत से भी हो जाती है। पहले यह बीमारी लाइलाज थी, लेकिन अब इसका इलाज संभव है। प्रदेश के हर सरकारी अस्पताल में इसके इलाज के लिए दवाइयां उपलब्ध है।
सरकारी अस्पतालों में 30 अक्तूबर से इस बीमारी का इलाज एफडीसी टेबलेट से किया जाने लगा है। पहले मरीजों को दवाइयों की किट दी जाती थी। नगर में 22 डॉटस सेंटर भी खुले हैं। जिन पर जाकर मरीज एक हफ्ते बाद किट की दवाइयां खाते थे। अब एफडीसी दवाइयां मरीज को अस्पताल या डॉटस सेंटर से एक माह के लिए अपने घर ले जाकर खाने को दी जाने लगी है।
किट के हिसाब से मरीज को प्रतिदिन के हिसाब से रोजाना 7 गोलियां खानी पड़ती थी, लेकिन एफडीसी की केवल मरीज को एक दिन में दो या तीन गोलियां ही खानी पड़ेगी। इसके अलावा मरीज को उसकी उम्र के हिसाब से दवाइयां खानी पड़ेगी। अब जो टीबी के मरीज प्राइवेट चिकित्सक के यहां इलाज तथा मेडिकल स्टोरों से दवाइयां लेकर खा रहे हैं। उन प्राइवेट चिकित्सकों और मेडिकल स्टार मालिकों को जिला अस्पताल में उन मरीजों का ब्योरा देना होगा।
वजन के हिसाब से गोली खानी होगी
टीबी के मरीज को अब वजन के हिसाब से गोलियां खानी पड़ेगी। आयु 25 वर्ष से 49 तक के मरीज को एक दिन में दो गोली। 40 वर्ष से 54 वर्ष तक के मरीज को एक दिन में तीन गोली। 55 से 79 वर्ष तक के मरीज को एक दिन में चार गोली तथा 79 वर्ष की आयु से अधिक वाले मरीज को प्रतिदिन पांच गोलियां खानी पड़ेगी।
जिला अस्पताल में टीबी के मरीज का पूरा इलाज करने पर आधुनिक मशीनों से सीबीनॉट कराया जा जाएगा। अगर फिर भी निगेटिव रिपोर्ट मिलती है, तो फिर मरीज को जिला अस्पताल से दवाई दी जाएगी
- देवेंद्र लोहित, वरिष्ठ उपचार पर्यवेक्षक, सीएचसी खतौली।