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शरीयत बोर्ड में चल रहे तलाक के 1500 केस

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शरीयत बोर्ड में चल रहे तलाक के 1500 केस
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मुजफ्फरनगर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तीन तलाक को लेकर मुस्लिम धर्मगुरु एकमत नहीं हैं। सदियों से चले आ रहे कानून में बदलाव की गुंजाइश से इंकार करने के साथ नए कानून के पक्ष में उलमा इत्तेफाक नहीं रखते हैं। तलाक के मामलों को लेकर आंकड़ों पर नजर डालें, तो शहर के शरीयत बोर्ड अध्यक्ष के पास 1500 से अधिक केसों की लंबी फेहरिस्त है।
शहर में वर्ष 1975 में शुरू हुआ शरीयत बोर्ड में तलाक के केस डालने का सिलसिला आज तक जारी है। शहर शरीयत बोर्ड में दीन की रोशनी और समझने-परखने के बाद फैसले किए जाते हैं। वर्ष 1998 में तक कार्यालय में तलाक, झगड़ों, मियां-बीवी के फसादों के ढेरों केस दर्ज थे, जिन्हें निपटाने के लिए कई-कई रोज तक उलमा बैठते थे और फैसले करते थे, तब तलाक के मामलों में एफआईआर या सजा नहीं होती थी, केवल सामाजिक एतबार से कार्रवाई होती थी। वर्ष 1998 में तलाक के मामलों में मुकदमा दर्ज होने के बाद से बोर्ड कार्यालय में केसों की संख्या घट गई। अभी तक यहां 1500 से अधिक केस दर्ज हैं। शहर शरीयत बोर्ड अध्यक्ष मौलाना इरफान ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कई तरह का विरोधाभास है। उन्होंने कहा कि मजहबी तौर पर यदि किसी ने एक बार में तीन तलाक दे दिया, तो वह मान्य है। उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता है। हां, मामले को दीनी रोशनी में परखा जाएगा, यदि वहां भी कोई गुंजाइश नहीं मिली तो तलाक माना जाएगा। उनके पास अधिकांश केस ऐसे हैं, जिनमें महिला ने शिकायत की है, लेकिन जांच हुई तो पुरुष ने तीन तलाक से इंकार किया है। महिला के पास तीन का सबूत नहीं है। साथ ही मोबाइल पर तलाक देने वाली बात पर कहा कि तलाक देने वाले और लेने वाले ने सुना है तो यह अवैध नहीं होगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार तीन तलाक मामले पर कोई कानून बनाती है, जिसमें दीन और मजहब का अहित है, उसे मंजूर नहीं किया जाएगा। इसका सीधा विरोध करने के बाद शरीयत कानून में दखलंदाजी नहीं होने दी जाएगी।
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न्याय में देरी भी कम कसूरवार नहीं
मुजफ्फरनगर। शरीयत कानून में तलाक के मामलों की जांच होती है, जबकि अदालत में महिलाएं हर्जे खर्चे के लिए वाद दायर करती हैं। महिलाओं को शरई कानून पर एतबार कम है, जिसके चलते अदालत-थानों के दरवाजे खटखटाए जा रहे हैं। महिला थाना की एसओ मीनाक्षी शर्मा ने बताया कि तलाक के बाद करीब 70 फीसदी मामले थाने में दर्ज किए जा रहे हैं। इनमें महिलाओं की शिकायत देरी से न्याय, दहेज उत्पीड़न के साथ खर्च को लेकर होती है।
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क्या है इस्लाम में तलाक
इस्लामिक कानून के मुताबिक निकाह एक सिविल करारनामा है, जिसमें लड़का-लड़की की ओर दो-दो गवाह होते हैं। वहीं, कुरान-ए-पाक के हिसाब से आदर्श तलाक वह है, जिसमें पति एक बार तलाक कह दे और फिर एक माह का वक्त दे। यह वक्त आपसी समझौते के लिए होता है। फिर उसके बाद दूसरे माह में एक गवाह की मौजूदगी में दूसरा तलाक कहे, फिर एक माह का समय देना होगा। इस अवधि में दोनों पक्षों की ओर से पंच बैठेंगे, जो सुलहनामा की कोशिश के साथ पति-पत्नी को समझाएंगे। हालांकि इस दौरान पति-पत्नी साथ नहीं रह सकते हैं। उसके बाद फिर से तीसरे माह गुंजाइश खत्म होने पर तलाक कहा जाएगा, तब तलाक मान्य होगा।
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