शिक्षा ऋषि को नेक संत कहते थे ज्ञानी जैल सिंह
मोरना। शुकतीर्थ से देश के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की अमिट यादें जुड़ी है। वे 34 साल पहले भागवत पीठ शुकदेव आश्रम आए थे और संत विनोवा भावे गऊ सदन की आधारशिला रखी थी। शिक्षा ऋषि वीतराग स्वामी कल्याणदेव के निष्काम सेवा और त्याग के जीवन दर्शन की इच्छा ज्ञानी को तीर्थ नगरी खींच लाई थी।
पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की 24 वीं पुण्यतिथि पर उनकी बातें याद आती है। स्वामी कल्याणदेव के दर्शन को वे 15 जनवरी, 1984 को शुकतीर्थ आए थे। उन्होंने विश्व शांति, राष्ट्रीय एकता यज्ञ की पूर्ण आहुति की थी। शुकदेव आश्रम में संत विनोवा भावे गऊ सदन की नींव रखी। भागवत पीठ शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती बताते हैं कि ज्ञानी जी गुरुदेव को नेक और परोपकारी संत कहते थे। तत्कालीन कैबिनेट मंत्री विद्याभूषण और राज्यसभा सदस्य रामचंद्र विकल की मौजूदगी में जिले भर से ग्रामीण तत्कालीन राष्ट्रपति को सुनने शुकतीर्थ में जमा हुए। एक बार शिक्षा ऋषि को अस्वस्थ होने पर दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह बात तत्कालीन राष्ट्रपति को पता चली तो वे 24 जून, 1986 को उन्हें देखने के लिए अस्पताल पहुंचे थे। राष्ट्रपति के ओएसडी रहे जिले के डॉ परमानंद पांचाल बताते है कि ज्ञानी जैल सिंह शिक्षा ऋषि की सादगी के कायल थे। शुकतीर्थ से बस द्वारा स्वामी कल्याणदेव दिल्ली के आईएसबीटी पहुंचे और पैदल ही राष्ट्रपति भवन पहुंच गए। जब ये बात उन्हें मालूम हुई तो तो वे संत के परम भक्त हो गए थे।
राष्ट्रपति को भेंट की थी बकरी
मोरना। शुकदेव आश्रम की सभा में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की सभा के मंच के नीचे एक बकरी आकर्षण का केंद्र थी। वीतराग संत ने ज्ञानी को यह बकरी भेंट की, ताकि वे बकरी का दूध पिएं। संत का उपहार देख राष्ट्रपति अचरज में पड़ गए। शुकतीर्थ से बकरी दिल्ली के राष्ट्रपति भवन ले जायी गई।