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दंगे की चिंगारी में सुलग उठा था गठवाला खाप क्षेत्र

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सुलग उठा था गठवाला खाप क्षेत्र
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बुढ़ाना। सात सितंबर 2013 को जनपद में भड़की दंगे की चिंगारी में गठवाला खाप क्षेत्र के गांव भी सुलग उठे थे। गठवाला खाप के गांव लांक, बहावड़ी, लिसाढ़, फुगाना, खरड़ व हसनपुर में हत्या व आगजनी की कई वारदातें हुईं, जिनमें तीन लोगों की जान गई। इनमें गांव के युवक व बुजुर्गों के खिलाफ भी मुकदमे कायम हुए थे।
करीब साढे पांच साल पूर्व 27 अगस्त 2013 को गांव कवाल में सचिन-गौरव की नृशंस हत्या के बाद हुई महापंचायतों और फिर सात सितंबर को भड़के सांप्रदायिक दंगे की चिंगारी गठवाला खाप के गांवों तक भी जा पहुंची थी। आपसी भाईचारे की मिसाल माने जाने वाले गठवाला खाप के गांवों में नफरत की चिंगारी इस कदर सुलगी कि गांव फुगाना में इस्लाम शेख पुत्र न्यादर और आशु लोहार की हत्या कर दी गई। वहीं, गांव खरड़ में सगीन मनियार की मौत हुई। तीन लोगों की हत्या के बाद उपजे डर व अविश्वास के चलते गांव के सभी विशेष समुदाय के लोग रातोरात घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में चले गए। दंगे शांत होने के बाद समुदाय विशेष के पीड़ितों द्वारा फुगाना के 166 ग्रामीण युवक व बुजुर्गों और खरड़ गांव में 12 ग्रामीणों के खिलाफ हत्या, आगजनी के साथ ही दुष्कर्म जैसी संगीन धाराओं में मुकदमे कायम हुए थे। जिनमें फर्जी रूप से फंसाए गए ग्रामीण बर्बाद हो रहे हैं। कई ग्रामीणों ने तो फर्जी मामलों में फंसे बच्चों को बचाने के लिए कथित पीड़ितों को रुपये देकर समझौता भी कर लिया है।
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तीन युवकों की हत्या के बाद चला साइलेंट वार का दौर
बुढ़ान। दंगा खत्म होने के कुछ दिन बाद ही बुढ़ाना कोतवाली क्षेत्र के गांव हुसैनपुर कलां के जंगल में दूसरे समुदाय के तीन युवकों की हत्या कर दी गई थी। तिहरे हत्याकांड की इस वारदात के बाद क्षेत्र में फिर से सांप्रदायिक तनाव हो गया था। तिहरे हत्याकांड की इस वारदात के बाद क्षेत्र में साइलेंट वार की घटनाएं शुरू हो गईं। इसके तहत, फुगाना में एक ही रात में दो दर्जन ग्रामीणों की ट्यूबवैलों में तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं थीं। किसानों की तैयार खड़ीं फसलों में भी काफी नुकसान किया गया। इन घटनाओं के चलते बहुसंख्यक वर्ग के युवाओं व महिलाओं का अकेले खेतों में जाना तक बंद हो गया था। तिहरे हत्याकांड के सभी 13 आरोपी कोर्ट से बरी हो चुके है।
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आज तक घर नहीं लौटे दंगा पीड़ित
बुढ़ाना। गठवाला खाप के गांवों फुगाना, खरड़, लांक, बहावड़ी व लिसाढ़ के दंगा पीड़ित माहौल शांत होने और सरकारी मुआवजा मिलने के बावजूद अब तक अपने घरों को नहीं लौटे हैं। उक्त दंगा पीड़ित दंगे के बाद गांव जौला, लोई, बुढ़ाना व जोगियाखेड़ा आदि गांवों में लगाए गए राहत शिविरों में चले गए थे। इनमें से कुछ परिवारों ने सरकारी मुआवजे से मिली रकम और गांव में अपने घर-बार बेचकर मिली धनराशि से विभिन्न स्थानों पर मकान बनाकर रहना शुरू कर दिया है। वहीं, बड़ी संख्या में दंगा पीड़ित अब भी गांव लोई, परासौली, जोगियाखेड़ा, सराय व जौला में विभिन्न संस्थाओं द्वारा बनाई गई दंगा पीड़ित कॉलोनियों में रहने लगे हैं।
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