चरथावल। खेती-किसानी से जुड़े परिवार के एक शख्स ने इंजीनियरिंग की नौकरी के बजाय फलों की खेती को तवज्जों दी। गांव महाबलीपुर के मीर दयाल उर्फ गंगाराम ने चीकू की खेती कर अपनी पहचान बनाई है। बंगलुरु में हिंदुस्तान पेट्रोलियम में कार्यरत रहते हुए उन्होंने कर्नाटक में चीकू के बाग देखे तो उन्हें अपने गांव में चीकू उगाने की ललक जग गई। 21 बीघा भूमि में चीकू उत्पादन कर वह अच्छी कमाई कर रहे हैं।
गांव महाबलीपुर के किसान मुलायम सिंह के बेटे मीर दयाल उर्फ गंगाराम की जिले में चीकू की खेती से विशिष्ट पहचान बन गई है। वर्ष 1994 में उन्होंने बंगलुरु के दयानंद सागर कॉलेज से बीई उत्तीर्ण की। वहीं एचपी कंपनी में नौकरी भी लग गई। अचानक उन्हें वहां चीकू के बाग देखने का मौका मिला। अपने गांव में चीकू उगाने की सोची और नौकरी छोड़ लौट आए। 21 बीघा भूमि में 250 चीकू के पेड़ रोपे। उस दौर में इंजीनियरिंग करना अहम था, लेकिन गंगाराम ने खेती को नए तरीके से करने की ठानी। करीब आठ साल में चीकू के पेड़ तैयार हुए। मार्च से जून के बीच चीकू की फसल साल में एक बार मिलती है। पेस्टीसाइड का वह प्रयोग नहीं करते हैं। बस मौसम अनुकूल रहना चाहिए। कम लागत खर्च में वे चीकू की फसल से प्रति बीघा तीस हजार रुपये तक कमा रहे हैं। चीकू की आपूर्ति हरियाणा, दिल्ली और देहरादून होती है। चीकू में कामयाबी के बाद उन्होंने 55 बीघा भूमि में लीची की फसल के साथ आम और अमरूद के पेड़ भी लगाए। गन्ने और गेहूं की खेती छोड़ पूरा वक्त फलों के उत्पादन को दे दिया। अपने फैसले से संतुष्ट मीर दयाल उर्फ गंगाराम कहते हैं कि खेती करने का शौक रहा, इसलिए इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ दी।
क्षेत्र के किसानों को भी मिली प्रेरणा
चरथावल। चीकू उत्पादक गंगाराम के प्रयोग से जिले के किसान भी प्रभावित हुए हैं। क्षेत्र के गांव पीपलशाह में एक दूसरे किसान ने अपने खेतों में चीकू के 80 पेड़ लगाए हैं। जय हिंद इंटर कॉलेज से पढे़ इंजीनियर किसान ने बेटी तनु को डाक्टर बनाने का सपना देखा है। पत्नी नमिता देवी और बेटा तुषार एवं हर्ष पिता के फल उगाने के निर्णय को सही बताते हैं।