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कर्मचारियों ने ही बिछा दिया मौत का जाल

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कर्मचारियों ने ही बिछा दिया मौत का जाल
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मुजफ्फरनगर। कलिंग उत्कल हादसे ने 22 जिंदगियों को लील लिया। हादसे में किसी की मांग का सिंदूर मिटा, किसी का भाई बिछड़ा-किसी की बहन, तो किसी के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। मगर, उत्तर रेलवे के आला अफसरान अभी तक यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर कौन है इन मौतों का जिम्मेदार। हादसे का कारण खुले ट्रैक से ट्रेन के तेज गति से गुजरना माना जा रहा है। कर्मचारियों की लापरवाही ने रेलवे ट्रैक पर मौत का जाल बिछा दिया था।
खतौली तहसील के सामने जहां उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई, वहां ट्रैक काफी समय से क्षतिग्रस्त था। तीन दिसंबर 2016 को यहां पहली बार ट्रैक क्रेक मिला था। दो माह पहले भी 11 जून को इसी स्थान पर फिर से ट्रैक क्रेक हो गया, तब तिलकराम इंटर कॉलेज के कर्मचारी राधेश्याम की सजगता से ट्रेन हादसा होने से बचा था। बार-बार इस स्थान पर ट्रैक क्रेक होने पर रेलवे ने यहां का पूरा ट्रैक नहीं बदला, बल्कि जोड़-तोड़कर काम चलाया जाता रहा। शुक्रवार रात यह ट्रैक फिर से खुल गया। शनिवार को रेलवे कर्मचारी इस क्षतिग्रस्त ट्रैक को ठीक करने पहुंच गए। रेलवे सूत्रों के मुताबिक रेल पथ निरीक्षक (पीडब्ल्यूआई) ने ट्रैक को ठीक करने की लिखित सूचना खतौली स्टेशन अधीक्षक को नहीं दी थी। यानि स्टेशन मास्टर को पता नहीं था कि स्टेशन से करीब 800 मीटर की दूरी पर ट्रैक मरम्मत का काम चल रहा है। इसलिए स्टेशन मास्टर की ओर से कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के चालक को कॉसन (सावधानता आदेश) नहीं दिया गया। उत्कल का खतौली में स्टॉपेज नहीं होने के कारण ट्रेन रेलवे के टाइम के अनुसार शाम 17.47 बजे खतौली स्टेशन से रन थ्रू गुजरी और चंद सैकड़ों के बाद ही तहसील के सामने खुले पड़े ट्रैक पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस भीषण हादसे से 22 यात्रियों के लिए उत्कल का सफर अंतिम सफर बन गया। इससे पहले इसी ट्रैक से 16.33 बजे दिल्ली जाने वाली कालका पैसेंजर और 16.55 बजे दिल्ली-सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन गुजरीं। दोनों ट्रेनों का स्टॉपेज खतौली में होने के कारण वे धीमी गति से खुले ट्रैक से गुजरी इसलिए हादसे का शिकार होने से बच गईं।
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मोड़ भी बना हादसे का कारण
मुजफ्फरनगर। जिस स्थान पर ट्रेन हादसा हुआ, उस स्थान पर रेलवे ट्रैक में तीक्ष्ण मोड़ है। यह मोड़ भी हादसे का कारण बना है। तेज गति से आती उत्कल एक्सप्रेस की पॉवर और चार बोगी सुरक्षित निकल गई, मगर जैसे ही ट्रेन मोड़ पर मुड़ी बीच के 11 कोच बेपटरी हो गए, जबकि इन बोगियों के बाद की चार बोगियां भी ट्रैक पर मौजूद रहीं।
लापरवाही की हद कर दी
मुजफ्फरनगर। तहसील के सामने कर्मचारियों ने ट्रैक को खोल रखा था। बावजूद कर्मचारियों ने वहां पर न तो कोई संकेत बोर्ड लगा रखा था और न ही झंडी लिए कोई कर्मचारी वहां खड़ा था। प्रत्यक्षदर्शी तिलकराम इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ एसपीएस अहलावत, मनोज बालियान के अनुसार पूरी गति से उत्कल एक्सप्रेस का आता देखकर ट्रैक पर काम कर रहे करीब 12 कर्मचारी अपना सामान मौके पर छोड़कर गलियों के रास्ते भाग गए। शायद उन्हें पता था कि खुले ट्रैक पर आते ही ट्रेन हादसे का शिकार हो जाएगी।
जीएम और डीआरएम
जवाब देने से बचते रहे
स्टेशन अधीक्षक के पास ट्रैक ठीक करने की कोई लिखित सूचना नहीं थी। बावजूद कर्मचारियों ने ट्रैक को खोल दिया। यानि कर्मचारियों ने ही यात्रियों की मौत का जाल बिछाया था। हादसे के बाद यहां डेरा डाले उत्तर रेलवे के जीएम आरके कुलश्रेष्ठ और डीआरएम आरएन सिंह हादसे के जिम्मेदार के बारे में पूछने पर मीडिया से बचते रहे। काफी पूछने पर दोनों अधिकारियों ने कहा कि पहली प्राथमिकता यात्रियों के बचाव की थी, अब दूसरी प्राथमिकता ट्रैक को सुचारु करने की है, जिम्मेदार कौन है, यह बाद की स्थिति है।
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लिखित में सूचना देना जरूरी
किसी भी क्षतिग्रस्त ट्रैक को ठीक कराने की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूआई की होती है। ट्रैक ठीक कराने के लिए उसे संबंधित स्टेशन अधीक्षक को लिखित में देना पकड़ा है कि रेलवे के अमुक किलोमीटर संख्या पर ट्रैक क्षतिग्रस्त है, जिसे ठीक करने के लिए 10, 15, 20 या 30 किलोमीटर प्रतिघंटा का कॉसन दिया जाएगा। इसके बाद कार्य स्थल से पहले दोनो ओर कॉसन संकेतक बोर्ड लगाए जाते है। साथ ही मौके पर कर्मचारी झंडी लेकर खड़े होते है। पीडब्ल्यूआई की लिखित सूचना पर स्टेशन अधीक्षक रेलवे कंट्रोल रूम को अवगत कराता है। इसके बाद प्रत्येक ट्रेन को स्टेशन पर रोक कर स्टेशन मास्टर की ओर से ट्रेन के चालक को लिखित में कॉसन दिया जाता है। जिसमें बताया था कि अमुक किलोमीटर पर ट्रेन को लिखित में दी गई स्पीड से ट्रेन को गुजारना है। यदि ट्रैक को पूरा बदलने का काम होता है तो ब्लॉक लिया जाता है, जिसकी मंजूरी रेलवे कंट्रोल रूम से दी जाती है। ब्लॉक की अवधि में इस स्थान से रेलों का संचालन निधारित समय तक रोका जाता है।
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ढाई दशक पुराना ट्रैक है खतौली में
मुजफ्फरनगर। दिल्ली-पटरी रेल मार्ग रेल के मानक के अनुसार 110 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार का है। इस रफ्तार तक इस ट्रैक पर ट्रेन दौड़ सकती है। रेलवे दोहरी करण के चलते मेरठ से लेकर पटरी तक का अधिकांश पुराना ट्रैक बदला जा चुका है, मगर खतौली-मंसूरपुर के बीच ट्रैक करीब 22 साल पुराना है, जिस कारण खतौली से ट्रेन निर्धारित गति से कुछ कम रफ्तार से गुजरती है।
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