केंद्र की यूपीए सरकार में मंत्री और किसी जमाने में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पर लगातार हमले कर रहे हैं लेकिन वे चुप्पी साधे हुए हैं।
कभी सूबे की राजनीति में मुलायम-बेनी की जोड़ी काफी चर्चित मानी जाती थी। सपा में बेनी का भी रुतबा वही था जो मुलायम का। बेनी के मुंह से निकली कोई बात मुलायम के मुंह की बात मानी जाती थी।
पर, आज उन्हीं बेनी के मुंह से मुलायम के लिए लुटेरा, बेईमान और आतंकियों से रिश्ते जैसे शब्द लोगों की सिर चकरा रहे हैं।
रिश्तों में दरार और दोस्त से दुश्मन बनी इस जोड़ी का एक शख्स इस हद तक कड़ुवा हो जाएगा, यह बात लोगों को ताज्जुब सी लग रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक मुलायम की एक शैली है कि वह नहीं बोलते। चुप रहते हैं। पर, उनके लोग बोलते हैं। इस मामले में भी यही हो रहा है।
मुलायम चुप रहकर और अनदेखी करके अपने पुराने दोस्त को चिढ़ाते हैं तो कभी बेनी के सामने खड़े होने से भी घबड़ाने वालों की तरफ से हमलाकर बेनी बाबू का गुस्सा भड़काते हैं।
सवाल यह उठ रहा है कि बेनी बाबू के मुलायम पर गुस्सा आने की वजह क्या है। यह गुस्सा कहां तक जाएगी। लोग यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि मुलायम ने आज तक बेनी बाबू पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की तो बेनी क्यों सपा मुखिया पर हमला बोलते जा रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकारों व राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुलायम की चुप्पी ही उनका विरोधी पर हमला है। लोग समझते हैं कि मुलायम जब कुछ नहीं कहते तो बेनी क्यों इस तरह की भाषा बोल रहे हैं।
मुलायम यही चाहते हैं कि लोग खुद ही बेनी को खारिज कर दें। यह निष्कर्ष सही भी लगता है। रविवार को भी यहां एक कार्यक्रम में आए मुलायम से न्यूज चैनल के रिपोर्टरों ने बेनी की बातों पर प्रतिक्रिया लेनी चाही तो वह मुस्कराते हुए आगे बढ़ लिए।
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं कि मुलायम की अनदेखी ही बेनी के गुस्सा की मुख्य वजह है। मुलायम ही नहीं राजनीति में जितने भी शीर्ष के नेता हैं, उनमें दो गुण समान रूप से पाए जाते हैं।
एक तो जो कंधे तक पहुंच जाए उसके परों को किसी न किसी तरह से छांट दो। किसी का कद घटाने या उसे चिढ़ाने का एक जरिया उसकी अनदेखी भी है।
बेनी बाबू का कद जब मुलायम को डराने लगा तो उन्होंने उनकी अनदेखी करनी शुरू कर दी। बेनी बाबू से यह बरदाश्त नहीं हुआ। मुलायम ने उन्हें चिढ़ाया और वह चिढ़ते-चिढ़ते अलग रास्ते पर चलने को मजबूर हो गए।
एक नहीं कई उदाहरण हैं कि रिश्तों में जब खटास आती है तो मिटने या मिटाने का भाव आता ही है। बेनी बाबू अलग हुए तो उन्होंने गुस्से में यही काम शुरू कर दिया। मुलायम ठहरे राजनीति के चतुर खिलाड़ी तो उन्होंने अनदेखी करके बेनी का गुस्सा बढ़ाया।
मुलायम कभी नहीं बोलते, उनके लोग बोलते हैं
रतन मणि लाल कहते हैं कि बेनी ने चूंकि सपा को खड़ा करने और बढा़ने में मुलायम के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था इसलिए वह जब अलग हुए तो उन्होंने मुलायम का विकल्प बनकर बदला लेने की सोची।
इसी चक्कर में उन्होंने कांग्रेस का सहारा लिया। जिससे वह सूबे में विकास कार्य कराकर और लोगों को जोड़कर मुलायम के लिए चुनौती बन सकें। पर, कांग्रेस कुछ वजहों से बेनी के मिशन में मददगार नहीं हो पाई।
मुलायम की एक शैली है कि वह नहीं बोलते। चुप रहते हैं। पर, उनके लोग बोलते हैं। इस मामले में भी यही हो रहा है।
कहां रुकेंगे बेनी के बिगड़ैल बोल
-मुलायम सिंह यादव दिन में ख्वाब देखने लगे हैं। दिल्ली में सरकार बनाने का उनका सपना कभी पूरा नहीं होगा।
-मुलायम कुनबे के मोह में डूबे हुए नेता हैं। धोखेबाज हैं।
-सपा को पार्टी नहीं परिवार है। मैं लंबे समय तक धोखे में फंसा रहा। इस पार्टी में पद-प्रतिष्ठा दूसरे को नहीं सिर्फ परिवार को ही मिलेगी।
-मुलायम की दखल के कारण उत्तर प्रदेश सरकार ठीक से काम नहीं कर पा रही। अखिलेश यादव मेरे पुत्र के समान हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामी के लिए मैं उन्हें जिम्मेदार नहीं मानूंगा।
-केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देना सपा-बसपा की मजबूरी है। यह मैं जानता हूं और आप भी जानते हैं। दोनों दलों के अध्यक्ष आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों की जांच से डरे हुए हैं।