एक गांव ऐसा है, जहां केवल मां ही मां रहती है। सैकड़ों बच्चों की किलकारियां यहां हर समय गूंजती रहती हैं। ये गांव है वात्सल्य ग्राम।
इसकी मुख्य विशेषता यहां फैली हरियाली नहीं बल्कि अपनी लंबी-चौड़ी गृहस्थी को संभालने वाली यशोदा माएं हैं।
इसकी मुख्य विशेषता यहां फैली हरियाली या मौजूद सभी सुविधाएं नहीं बल्कि अपनी लंबी-चौड़ी गृहस्थी को संभालने वाली यशोदा माएं हैं।
दीदी मां साध्वी ऋतंभरा के प्रेम से पल्लवित और बिना जन्म दिए दर्जनों बच्चों की मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करने वाली ये मां और इनका संसार अद्भुत है। जो मां नहीं वो मौसी है।
वात्सल्य ग्राम के पालना में आए बच्चे को नर्सरी से लेकर गोकुलम (केंद्र जिसमें बेबी केयर यूनिट है और नवजात को सर्वप्रथम कुछ दिन यहीं रखते हैं), छोटे बच्चों का विद्यालय शिशु मंगल और अपने-अपने घरों में पालती ये मां यशोदाएं हैं।
इन माओं के हृदय में वात्सल्य और आंखों में सिर्फ अपने बच्चों के लिए सपने हैं। वात्सल्य ग्राम में अलग-अलग प्रदान किए गए घरों में रहने वाली इन माओं में अपने बच्चों को दूसरों से आगे निकालने की तीव्रता और लालसा भी दिखती है।
सीता मां, सुमन, शोभा, उमा, सुजाता, शास्वती, शम्बिका, प्रिया आदि 16 माएं 200 से ज्यादा बच्चों को संभाल रही हैं।
मंजिल की दौड़ में शामिल हमारी बेटियां
उस चेहरे पर एकाएक उभरी चमक देखने लायक थी, जब एक मां ने बड़े उत्साह से बताया कि वात्सल्य ग्राम की दो बेटियों की हाल ही में शादी हो गई है।
एक बेटी दिल्ली में डेंटिस्ट बनने की दिशा में अग्रसर है तो एक इंटीरियर डिजायनिंग का कोर्स कर रही है।