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कोरोना की लड़ाई में बच्चों से दूरी बन गई थी मजबूरी

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ऑपरेशन करतीं महिला चिकित्स। - फोटो : CITY
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मुरादाबाद। कोरोना संक्रमण काल के करीब एक साल बाद हालात बदलने लगे हैं। सब कुछ सामान्य होने लगा है। इसके पीछे लॉकडाउन के दौर में कोरोना योद्धाओं का संघर्ष छिपा है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में रहकर कोविड डयूटी के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को निभाया। इसमें तीन महिला डाक्टरों ने भी पुरुष डाक्टरों के साथ कोरोना की जंग लड़ी। अरबन पीएचसी की प्रभारी इन तीन महिला डाक्टरों ने रैपिड रिस्पांस टीम (आरआरटी) लीडर की जिम्मेदारी निभाई। संक्रमित मरीजों के घर जाकर परिवार के सदस्यों का सैंपल कराने, उनके कांटेक्ट ट्रेस कराने, अस्पताल में भर्ती कराने, होम आइसोलेशन में दवाइयां पहुंचने तक का काम किया। इन डाक्टरों का कहना है कि ड्यूटी में सबसे बड़ी चुनौती खुद को और परिवार के सदस्यों कोविड बचाए रखना था। आशंकित मरीजों को सैंपल के लिए कनवेंशन करना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। इन सबके बीच घर पहुंचकर बच्चों से दूरी बनाना सबसे मुश्किल काम था। जो कोरेाना की लड़ाई में मजबूरी बन गई थी।
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ड्यूटी से ज्यादा परिवार की जिम्मेदारी थी चुनौती
मुरादाबाद। डा. रेशमा कुरैशी अरबन पीएचसी टाउनहॉल प्रभारी हैं। लॉकडाउन में उन्हें आरआरटी गलशहीद की जिम्मेदारी मिली थीं। वह टीम लीडर थीं। बतातीं हैं कि शुरुआत में सब कुछ नया था। कोरोना को लेकर डर और दशहत का माहौल था। विदेश यात्रा से लौटने वालों के घर जाकर उनकी ट्रैवल हिस्ट्री जुटानी पड़ती थी। लोग सही जानकारी देने से बचते थे। गलशहीद एरिए में संक्रमित मिलने पर उनके परिवार की टेस्टिंग, उनके कांटेक्ट ट्रेसिंग करनी पड़ती थी। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी भी संभाली पड़ती थी। जो कोविड ड्यूटी से अधिक चुनौती पूर्ण थी। दस साल के बेटे और छह साल की बेटी से दूरी बनाकर रखनी पड़ती थी।
बच्चाें के लिए टिफिन में रखकर आती थी खाना
मुरादाबाद। अरबन पीएचसी मझोला की प्रभारी डा. अर्चना यादव आरआरटी मझोला की लीडर थीं। कहतीं हैं कि कोविड डयूटी के दौरान कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। डाक्टर पति संभल में कोविड डयूटी करते थे। छोटे बच्चे घर पर अकेले रहते थे। लॉकडाउन में मेड भी नहीं थी। बच्चों के लिए खाना बनाकर स्कूल टिफिन में रखकर आती थी। शुरुआत में रात आठ बजे तक ड्यूटी करनी पड़ी थी। घर संभालने में बहुत मुश्किल आती थी। खुद का सैंपल कराने के बाद घर जाकर बच्चों से दूरी बनाना बहुत मुश्किल होती थी। डयूटी के दौरान संक्रमितों के कांटेक्ट ट्रेस करना और उन्हें सैंपल कराने के लिए तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं थी।
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तबीयत बिगड़ने पर आधी रात मरीजों को कराना था शिफ्ट
मुरादाबाद। रैपिड रिस्पांस टीम कोतवाली की लीडर रहीं डा. किरन गौतम बतातीं हैं कि लोगों के बीच जाकर उन्हें आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए राजी कराना एक बड़ी चुनौती थी। संक्रमित के संपर्क वाले बड़ी मुश्किल से सैंपल कराने के लिए तैयार होते थे। होम आइसोलेशन शुरू होने पर हर मरीज घर पर रहना चाहता था, इसके लिए उनके घर जाकर इंतजाम देखने पड़ते थे। तबीयत बिगड़ने पर कई बार रात बारह और एक बजे के बाद भी मरीजों के कॉल आ जाती थी। इन मरीजों को एंबुलेंस भेजकर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था। सात और नौ साल के दोनों बेटों के लिए खाना बनाकर ड्यूटी पर जाती थी। सैंपल कराने पर रिपोर्ट आने तक बच्चों से दूरी बनाकर रहती थीं। डा. किरन अरबन पीएचसी मुकर्रबपुर की प्रभारी हैं।
साढ़े चार साल से जिला अस्पताल की सेहत महिलाओं के हाथ
मुरादाबाद। जिला पुरुष चिकित्सालय की कमान करीब साढ़े चार साल से महिलाआें के हाथ में है। डा. ज्योत्सना पंत ने सितंबर 2016 में एसआईसीसी जिला अस्पताल की बागडोर संभाली थी। उनके कार्यकाल में अस्पताल का कायाकल्प हुआ। मरीजों से जुड़ी नई सुविधाएं शुरू की गई। पदोन्नति होने पर अक्तूबर में उनका तबादला लखनऊ हो गया। इसके बाद महिला अस्पताल की सीएमएस डा. कल्पना सिंह के हाथों में पुरुष अस्पताल की कमान आ गई। पिछले चार महीने से डा. कल्पना सिंह बखूबी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन कर रही हैं।
महिलाओं के हवाले डेढ़ सौ परिषदीय स्कूल
मुरादाबाद। देश और समाज की तरक्की में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली महिलाओं की भूमिका शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी है। बेसिक शिक्षा विभाग में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की भागीदारी अधिक है। जिले के डेढ़ सौ परिषदीय स्कूल महिलाओं के हवाले है। यहां रसोइया से लेकर प्रधानाध्यापक तक महिलाएं हैं।
जिले में 1408 परिषदीय स्कूल हैं। इनमें 172989 बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चाें में शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए 5720 शिक्षकों की तैनाती है। इसमें महिलाओं की संख्या 3947 है, जो 69 प्रतिशत भागीदारी है। वहीं पुरुष शिक्षकों की संख्या 2773 है। डेढ़ सौ स्कूलों की बागडोर महिलाओं के हाथ में है। यहां महिला स्टाफ की तैनाती है। प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक, शिक्षामित्र और रसोइया सब महिलाएं हैं। जो बच्चों को शिक्षित बनाने में जुटी हैं। बीएसए योगेंद्र कुमार ने बताया कि जिले में महिला शिक्षकों की संख्या अधिक है। करीब डेढ़ सौ स्कूल महिलाओं के हवाले हैं।
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सरकारी अस्पतालों में महिलाओं की स्थिति
- महिला डाक्टरों की संख्या : 56
- महिला स्टाफ नर्स की संख्या : 200
- एएनएम की संख्या : 294
- महिला काउंसलर और अन्य की संख्या : 10
शिक्षा विभाग की महिलाओं की स्थिति
- कक्षा नौ से बारह तक के स्कूलों में महिला शिक्षकों की तैनाती : 3751
- कक्षा एक से आठ तक स्कूलों में महिला शिक्षकों की तैनाती : 3947
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