कुछ ही दिन जाते हैं स्कूल
एनजीओ के मुताबिक सैकड़ों बच्चे ऐसे भी हैं जिनका स्कूलों में एडमिशन तो है, लेकिन वह साल में कुछ ही दिन स्कूल जाते हैं। ऐसे बच्चों के माता-पिता रेहड़ी आदि लगाने का काम करते हैं। जिसमें अपने बच्चों से काम में मदद लेते हैं। रुपयों के लालच में बच्चों का बचपन छिन रहा है।
वहीं घुमंतू तबके के लोगों के बच्चे क्षेत्र बदलने के कारण लगातार स्कूल नहीं जा पाते। जिस क्षेत्र में उनके माता-पिता काम करते हैं, कुछ महीने बाद उसे छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है।
कई बस्तियों के बच्चे शिक्षा से दूर
मऊ, मोरा की मिलक, हरथला, हिमगिरी, शराफत नगर, कांशीरामनगर, आदर्श नगर, खुशहालपुर, दिल्ली रोड के किनारे, कुंदनपुर ढक्का, जयंतीपुर, कोहिनूर तिराहा, नवाबपुरा, बंगला गांव, दस सराय, नया गांव, चक्कर की मिलक आदि क्षेत्रों में कई बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। इन इलाकों की बस्तियों में रहने वाले कई परिवार बच्चों को विभिन्न कारणों से पढ़ा नहीं पा रहे हैं। ऐसे बच्चों के विद्यालयों में प्रवेश के लिए आरटीई के तहत सीटें बढ़ाई गई हैं।
बीएसए विमलेश कुमार ने बताया कि पिछले साल 624 निजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला हुआ था, जिसमें कम आय वर्ग के 5,126 बच्चों को दाखिला मिला था। इस बार 1,111 निजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला होगा, जिसमें प्रत्येक स्कूल में 25 प्रतिशत छात्र दाखिला लेंगे। बच्चों को उसी वार्ड के स्कूल में दाखिला दिया जाएगा, जहां वह रहते हैं। दाखिले या पढ़ाई के लिए कोई फीस नहीं ली जाएगी।
स्कूल चलो अभियान व हाउस होल्ड सर्वे से तमाम बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराया गया है। जिले में छह से 14 वर्ष की उम्र का कोई बच्चा ड्रॉप आउट नहीं है। - बुद्ध प्रिय सिंह, एडी बेसिक
जिले में ड्रॉप आउट बच्चों का आंकड़ा कम करने के लिए काम किया जा रहा है। कई बच्चे बेसिक स्कूलों के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। कोई स्पष्ट आंकड़ा हमारे पास नहीं है, लेकिन चार लाख संख्या ज्यादा लग रही है। हम सबको स्कूल भेजने का प्रयास करेंगे। - मनोज द्विवेदी, सहायक शिक्षा निदेशक