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Moradabad News: दुनियाभर में मचाया हुल्लड़ पर मुरादाबाद कभी नहीं छूटा

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मुरादाबाद। सब कुछ ठीक चल रहा था। मुंबई में फिल्मों में पहचान बनने लगी थी। गीतकार के साथ अभिनेता के तौर पर भी। उन्हें मनोज कुमार का संरक्षण हासिल था। फिर भी वह अपने शहर में लौट आए। इसी मुरादाबाद में। किसी ने पूछा, सब मुंबई में बसने के लिए परेशान रहते हैं और आप वापस लौट आए, भला क्यों? उन्होंने अपनी चिरपरिचित हास्य मुद्रा में जवाब दिया, जो मजा मुरादाबाद में है वह और कहां! यह थे सुशील कुमार चड्ढा, जिन्हें दुनिया ने हुल्लड़ मुरादाबादी के नाम से जाना।
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उनके बिना उस दौर का कोई कवि सम्मेलन और मुशायरा मुकम्मल नहीं माना जाता था। यह उस दौर की बात है, जब मंच पर काका हाथरसी, गोपालदास नीरज से लेकर ओम प्रकाश आदित्य, बाल कवि बैरागी इत्यादि न जाने कितने दिग्गज मौजूद थे। हालांकि, मुरादाबाद आने के कुछ साल बाद 2000 में फिर मुंबई चले गए, लेकिन यह शहर उनसे कभी नहीं छूटा। अपनी मुरादाबादी पहचान को उन्होंने जिंदगी भर सीने से लगाए रखा। किसी तमगे की तरह। यह शहर उन्हें आज भी आज याद करता है।





सिविल लाइंस के सुरेंद्र नाथ शर्मा उर्फ फक्कड़ मुरादाबादी उन्हें अपना गुरु कहते हैं। फक्कड़ बताते हैं, हुल्लड़ को सुनकर, पढ़कर मैंने लिखना शुरू किया। अपनी रचनाएं उनसे जंचवाने का खूब मौका मिला। बाद में उन्होंने ही पहली बार बड़े मंच पर पढ़ने का मौका दिया। उस मंच पर हुल्लड़ और काका हाथरसी दोनों बड़े हास्य-व्यंग्य के कवि थे। दोनों ने मिलकर मेरा नाम सुरेंद्र नाथ शर्मा से बदलकर फक्कड़ मुरादाबादी रख दिया। मैं और मक्खन भाई दोनों उनसे खूब प्रभावित थे।
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नवगीतकार योगेंद्र वर्मा व्योम कहते हैं, हुल्लड़ जी हास्य के कवि जरूर थे, लेकिन उनकी रचनाओं में व्यंग्य की गहरी मार हुआ करती थी। बोफोर्स कांड के दौर में बिन चड्ढा का नाम अखबारों में खूब छपता था। तब उनकी एक कविता जैसे सियासी मुहावरा बन गई थी- तुम बिन चड्ढा, हम बिन चड्ढी...।

साहित्यकार डॉ. मनोज रस्तोगी कहते हैं, हुल्लड़ मुरादाबादी ने अपनी रचनाओं से न केवल श्रोताओं को गुदगुदाया बल्कि रसातल में जा रही राजनीतिक व्यवस्था पर पैने कटाक्ष भी किए। सामाजिक विसंगतियों को उजागर किया तो आम आदमी की जिंदगी की समस्याओं को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया। आईएस जौहर की फिल्म नसबंदी में हुल्लड़ जी का गीत... क्या मिल गया सरकार तुझे इमरजेंसी लगाकर। इसे संगीतबद्ध कल्याणजी-आनंदजी ने किया, महेंद्र कपूर व मन्ना डे ने गाया।
गजलकार कृष्ण कुमार नाज कहते हैं, हुल्लड़ मुरादाबादी ने इस शहर में कवि सम्मेलन और मुशायरों के आयोजनों को बढ़ाया। लोगों को संस्कृति से जोड़ने के लिए काम किया। वर्ष 1970 में उन्होंने बुध बाजार से प्रकाशित हास्य व्यंग्य की मासिक पत्रिका हास परिहास का संपादन–प्रकाशन किया। उस दौर में जिगर मंच पर होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरों के बाद देश के दिग्गज रचनाकार हुल्लड़ जी के पंचशील कॉलोनी वाले घर पर चाय की दावत पर पहुंचते थे।
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हुल्लड़ मुरादाबादी से मिलिए
- अच्छा है पर कभी-कभी, क्या करेगी चांदनी समेत 16 कृतियां प्रकाशित हुईं
- फिल्म संतोष में उन्होंने अच्छी भूमिका निभाई
- शिवानी की कहानी पर आधारित फिल्म बंधन बांहों का में अभिनय किया
- काका हाथरसी पुरस्कार, महाकवि निराला सम्मान, हास्य रत्न अवाॅर्ड जैसे कई पुरस्कार मिले
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