बुखार से तप रहे एक मजदूर को वक्त से इलाज नहीं मिला और उसने दम तोड़ दिया। रोड़ा बने 1000- 500 रुपये के पुराने नोट। परिजन गंभीर हालत में सुनील को लेकर घर से निकले तो टैक्सी वाला छुट्टे मिलने तक टस से मस न हुआ। कलेजा निजी चिकित्सक का भी नहीं पसीजा।
डाक्टर ने साफ कहा, इलाज चाहिए तो 100- 100 के नोट लाइए। घर वाले हजार - पांच सौ के बदले 100- 100 के नोटों का इंतजाम करने में जुटे रहे उधर अस्पताल के दरवाजे पर सुनील ने दम तोड़ दिया।
कुंदरकी के मोहल्ला नुरूल्ला में शिव मंदिर के पास रहने वाले मंगा चौधरी का बेटा सुनील उर्फ पप्पू दिवाकर (30) मजदूरी कर परिवार का पेट पालता था। दो-तीन दिन पहले उसे बुखार आया था। परिजनों ने कुंदरकी में इलाज कराया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। डाक्टर ने शहर ले जाने की सलाह दी तो परिजन सुनील को लेकर चले।
लेकिन मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए बुलाई गई टैक्सी का चालक अड़ गया, बोला पहले 100- 100 के नोटों में पेमेंट एडवांस में करो तभी मरीज लेकर चलूंगा। परिजनों के करीब दो- तीन घंटे इसी कवायद में बीत गए। बैंक की लंबी कतार में लगने के बावजूद नोट नहीं बदले।
जैसे - तैसे दो - चार हजार रुपये का बंदोबस्त करके परिजन सुनील को लेकर लाजपत नगर में एक निजी डाक्टर के क्लीनिक पर पहुंचे। छुट्टे पैसों में डाक्टर इलाज करता रहा लेकिन जब बारी 500- 500 की आई तो बोला आगे का इलाज बाद में पहले 100- 100 के नोट लाओ।
मनुहार करने पर भी डाक्टर का कलेजा नहीं पसीजा। छुट्टे पैसे खत्म हुए तो डाक्टर ने मरीज को रेफर कर दिया। इसके बाद शहर के एक निजी अस्पताल में सुनील को ले जाया गया। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
यहां भी नोटों का मामला आड़े आया। हालांकि इतनी गनीमत थी कि मरीज की जांचें शुरू कर दी गई थीं। लेकिन शायद देर बहुत ज्यादा हो चुकी थी, इससे पहले कि जांचें पूरी होतीं सुनील ने दम तोड़ दिया।