तीन तलाक पर छिड़ी बहस के बीच उलमा ने कहा कि कुरान के मुताबिक तय मियाद के साथ एक-एक तलाक कहने पर जोर दिया गया है। एक तलाक कहने पर रिश्ता बने रहने की गुंजाइश बनी रहती है। एक-एक कर तीन तलाक देना ही बेहतरी है।
जबकि तीन तलाक पहले से तैयार पृष्ठभूमि पर आया पलभर का गुस्सा है। लेकिन इस गुस्से का खामियाजा शौहर और बीवी को जिंदगी भर उठाना पड़ता है। इससे मुसलमानों को बचना चाहिए। तीन बार में तलाक के प्रति लोगों को जागरूक किया जाएगा।
लेकिन शरीयत में बदलाव कुरान और हदीस की मुखालफत है। शरीयत का कानून किसी इंसान ने बनाया नहीं है। इसमें बदलाव मुमकिन नहीं है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने कामन सिविल कोर्ट और तीन तलाक की प्रक्रिया को खत्म करने मुखालफत जरूर की है, लेकिन मुसलमानों को एक साथ तीन तलाक कहने से बचने की भी नसीहत दी है।
मौलाना गुलाम मुस्तफा नईमी ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि किसी की गलती के लिए मुस्लिम पर्सनल ला में कोई बदलाव नहीं को सकता है। शरीयत में बदलाव का हक किसी इंसान को नहीं है। शरीयत में बदलाव यानी कुरान और हदीस की सीधी मुखालफत है। तलाक बाद औरत को भरण पोषण के लिए शौहर को खर्चा देना होता है। यही नहीं बालिग होने तक बच्चे का खर्च उठाना पड़ता है। अगर कोई मर्द तलाक के बाद ऐसा नहीं करता है तो ये शरीयत के खिलाफ है।
मुफ्ती मोहम्मद दानिश अशर्फी कादरी ने शरीयत में बदलाव को खारिज करते हुए कहा कि तीन बार में तलाक अफजल और आला तरीका है। इसमें औरत और मर्द को तीन महीने का वक्त मिल जाता है। इस दौरान दोनों को अपने रिश्ते सुधारने का मौका मिल जाता है। वहीं अगर निगाह के बाद किसी औरत पर उसका शौहर जुल्म या ज्यादती करता है। औरत को उसका मिजाज पसंद नहीं आ रहा है। ऐसी स्थिति में खुला के जरिए वह शौहर से अलग हो सकती है।