तालाब, कुएं, नदियां, हमारी संस्कृति और सभ्यता के अभिन्न अंग हैं। लेकिन शहरीकरण और विकास की अंधी दौर में हम प्रकृति से दूर होने के साथ-साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को भी भूलते जा रहे हैं।
गोपलपुर के लोगों को छोड़ कर इस गांव का नाम शायद ही महानगर में कोई जानता होेगा। इस गांव को अब लोग बुद्धि विहार के सेक्टर 7 में गिनते हैं। लेकिन सेक्टर सात में जिस तालाब का आवास विकास ने आधा अधूरा सौंदर्यीकरण कर अनुपयोगी बना दिया है। इस तालाब का पानी कभी गोपलपुर के लोगों के लिए पीने, नहाने के काम आता था।
इस गांव में दो कुएं भी वजूद में थे लेकिन अब एक कुंआ रोड के नीचे कहीं गुम हो गया है तो दूसरा अपनी निशानी छोड़ गया है। सेक्टर सात में जो तालाब है उसमें पानी नहीं है। यहां आवास विकास ने तालाब के चारों ओर ईंट की दीवार से घेर कर ऊंची रैलिंग लगा दी है। बरसात का पानी आने के लिए इसमें मात्र एक पुलिया बनाया है।
लेकिन अब इस तालाब में बरसात का पानी नहीं रुकता। कम बरसात और वाटर लेबल गिरने से पानी तालाब में रुकता ही नहीं। जबकि आज से पच्चीस से तीस साल पहले इस तालाब का पानी लोग पीते थे। इस तालाब में चारों तरफ से बरसात का पानी बहकर आता था। लोग यहां नहाते थे। तालाब में साल भर पानी भरा रहता था।
लेकिन अब यहां घास उगी हुई है। ऐसे में कहा सकते हैं कि तालाब का सौंदर्यीकरण नहीं बल्कि एक बड़े से गड्ढे का सौंदर्यीकरण हुआ है। अब तालाब लोगों के लिए किसी तरह से उपयोगी नहीं रहा। यहां रहने वाले 75 वर्षीय जबर सिंह ने बताया कि यह तालाब करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। यह तालाब इस गांव के लिए बहुत उपयोगी था। कश्मीरी देवी ने बताया कि हम यहां अपने जानवरों को भी पानी पिलाते थे।
आज भी अपने होने का सबूत दे रहा एक मात्र बचा कुएं का अवशेष
इस गांव में दो कुएं भी थे। एक कुंआ तो सड़क बनने में भेंट चढ़ गया और सदा के लिए दफन हो गया। लेकिन एक कुआं अब भी अपने होने की गवाही दे रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब हैंड पंप नहीं था तो इन्हीं दो कुएं से लोग पानी भरते थे। यहां तक की यहां से पानी निकालकर खेतों की सिंचाई भी करते थे।
लेकिन धीरे-धीरे कुएं का पानी गंदा होने के साथ ही सूखने लगे। जब कुएं सूख गए तो उसमें लोग कूड़ा कचरा डालने लगे और कुएं समाप्त हो गए।