मुरादाबाद। बड़े बुजुर्र्गों होने वाली शुगर की बीमारी अब बचपन को घेरने लगी है। जिले में करीब पांच सौ से अधिक बच्चे टाइप वन डायबिटीज से जूझ रहे हैं। ऐसे बच्चों की दिनचर्या इंसुलिन इंजेक्शन से शुरू होती है। वहीं खानपान में लापरवाही बरतने से बीस साल तक युवाओं में भी अब टाइप टू डायबिटीज की जद में आने लगे हैं। जीवनशैली और खानपान में बदलाव से इस पचबन की बीमारी से बचा जा सकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि माता-पिता के मधुमेह ग्रस्त होने पर संतान में इस रोग के बढ़ने की पूरी आशंका रहती है। फास्ट फूड का बढ़ता चलन और शारीरिक श्रम से दूरी भी बच्चों को मधुमेह की चपेट में ला रही है। टाइप वन डायबिटीज से जूझ रहे बच्चे शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो जाते है। बीमारी से अंजान परिजन टीबी तक की दवा करवा डालते हैं। लेकिन सेहत में कोई सुधार नहीं होता है। वजन तेजी से घटता चला जाता है। शुगर की जांच कराते हैं तो रिपोर्ट देख परिवार वाले भौचक्के हो जाते हैं। ऐसे बच्चे टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित होते हैं। शुगर से पीड़ित ऐसे बच्चों की दिन की शुरुआत इंसुलिन से होती है। स्कूल हो या घर चौबीस घंटे में उन्हें चार बार इंसुलिन लेना पड़ता है। जिले में टाइप वन डायबिटीज के करीब पांच सौ बच्चे होंगे, जिनकी दिन की शुरुआत इंसुलिन से होती है। टिफिन में खाने के साथ इंसुलिन रखा जाता है। जो अपनों और इंफेक्शन से मिली इस बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर फैमिली हिस्ट्री में डायबिटीज है और इंफेेक्शन की शिकायत है तो बच्चों की शुगर की जांच जरूर कराएं।
ये लक्षण सामने आए तो बच्चे की शुगर जांच कराएं
- चक्कर आता है
- पसीना आने लगता है
- घबराहट होती है
- सुस्ती लगती है
- बच्चे को अधिक भूख और प्यास लगे
- रात में बार-बार पेशाब की शिकायत
- फैमिली हिस्ट्री है
- बच्चा अधिक मोटा है
मेडिकल साइंस की भाषा में ये जुवेनाइल डायबिटीज
मुरादाबाद। हर मां-बाप की चाहत होती है कि उनका बच्चा ऐसी डाइट ले जो पौष्टिक हो, लेकिन वह अपने बच्चे को पौष्टिक डाइट नहीं दे सकते हैं। ये वे बच्चे हैं, जिनको जन्म के साथ ही शुगर की बीमारी हो गई है। मेडिकल साइंस में इसे जुवेनाइल डायबिटिज कहा जाता है।
इंफेक्शन भी बनते हैं कारण
मुरादाबाद। इंसुलिन एक तरह का हार्मोन है। जिसे अग्नाश्य (पैनक्रियाज) में बीटा सेल्स तैयार करते हैं। यह हार्मोन रक्त में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करता है। लेकिन बार-बार वायरल और दूसरे इंफेक्शन से बीटा सेल्स डैमेज हो जाते हैं। नतीजतन इंसुलिन नहीं बन पाता है। शरीर में इंसुलिन न होने की स्थिति में शरीर की कोशिकाएं ग्लूकोज का ऊर्जा के रूप में उपयोग नहीं कर पाती है, इसके कारण शरीर की कार्यप्रणाली ठीक ढंग से नहीं हो पाती है।
पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती है पैनक्रियाज
मुरादाबाद। एमडी मेडिसिन डा. अमित रस्तोगी का कहना है कि पैनक्रियाज में आइलेट्स ऑफ लैंगर हैंस सेल्स इंसुलिन बनाती है। इंसुलिन ब्लड में ग्लूकोज को नियंत्रित करती हैं। ये सेल्स कम हो जाती हैं तो इंसुलिन बनना बंद हो जाता है। तब डायबिटीज होने लगती है। कुछ बच्चों में पैनक्रियाज पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाती है। इसके चलते इंसुलिन समुचित मात्रा में नहीं बनता है। बच्चे के जन्म के वक्त तो पता नहीं चल पाता है लेकिन छह महीने की उम्र में आते-आते इस रोग का पता चलता है। इसे कंजेनाइटल डायबिटीज कहते हैं।
इमरजेंसी में पहुंचते हैं बच्चे
मुरादाबाद। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शलभ अग्रवाल का कहना है कि बच्चों में शुगर का पता नहीं चल पाता है। जब बच्चों का शुगर चार सौ से पांच सौ पहुंच जाता है तो उनकी हालत बिगड़ने लगती है। तब अभिभावक इमरजेंसी में बच्चों को लेकर पहुंचते हैं। इसके बाद उन्हें बच्चों में शुगर की बीमारी का पता चलता है।
इंसुलिन से डरने की जरूरत नहीं
मुरादाबाद। मधुमेह रोग विशेषज्ञ डॉ. सैयद मोहम्मद रजी बताते हैं कि आमतौर पर अभिभाव बच्चों को इंसुलिन देने से डरते हैं। इंसुलिन की बजाए दूसरी पद्धति से इलाज कराने लग जाते हैं, जबकि इंसुलिन से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि जागरूक होने की जरूरत है। टाइप वन डायबिटीज के बच्चों को इंसुलिन देने जरूरी होता है। चौबीस घंटे में तीन से चार बार इंसुलिन लेना चाहिए।
डायबिटीज के कारण
-परिवार में किसी को डायबिटीज होना
-वजन जरूरत से ज्यादा होना
-हाई ब्लड प्रेशर
-अधिक कोलेस्ट्रॉल
-श्रमरहित जीवन
डायबिटीज के लक्षण
-कमजोरी महसूस होना
-बार-बार पेशाब लगना
-अधिक प्यास लगना
-आंख से धुंधला दिखाई देना
-घाव या चोट का देर से ठीक होना
-यौन प्रणाली संबंधी विकार
-बिना किसी खास वजह के वजन का घटना
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डाक्टरों की सलाह
-व्यायाम करें और तनाव मुक्त रहें
-खानपान पर विशेष ध्यान रखें
-ब्लडप्रेशर की जांच कराएं
-हार्ट का चेकअप कराएं
-हर छह महीने में दांतों की जांच करवाएं
-हर साल आंखाें की जांच कराएं