सामूहिक जिम्मेदारी से बच्चों को सही रास्ता दिखाएं
मनोरोग विशेषज्ञ डाॅ. अनंत राणा का कहना है कि अभिभावक स्वयं फोन में व्यस्त रहते हैं। इसलिए बच्चे भी फोन के आदी हो गए हैं। बच्चों द्वारा फोन का इस्तेमाल किए जाने के बाद अभिभावक उसे चेक नहीं करते हैं। आजकल के बच्चों को सबकुछ पता है, क्योंकि इंटरनेट पर सब उपलब्ध है, लेकिन वह अच्छे और बुरे में फर्क करना नहीं समझ पा रहे हैं।
इस घटना में अभिभावक, शिक्षक, समाज, सरकार सभी जिम्मेदार हैं। सभी को अपनी-अपनी भूमिका पर गंभीरता से सोचना होगा। दोषारोपण करने के बजाय आपसी सामंजस्य से बच्चों को भटकने से रोकना होगा। स्कूलों में अकेडमिक्स के बजाय एक्स्ट्रा कैरिकुलम पर ध्यान केंद्रित करना होगा। तभी बच्चे अपना सफल जीवन जी पाएंगे।
मनोविश्लेषक डाॅ. मीनू मेहरोत्रा ने कहा कि इस घटना के पीछे अभिभावकों की अनदेखी व संवादहीनता है। अभिभावक शिक्षकों से नंबरों और परिणाम पर बात करते हैं, लेकिन नैतिकता पर बात नहीं होती। परिवारों में बुजुर्गों का साथ न होना बच्चों को अहंकारी और निरंकुश बना देता है।
ऐसे में जब कोई उनकी गलतियों के लिए डांटता है तो वह सुधरने के बजाय उस व्यक्ति को ही नुकसान पहुंचाने के तरीके ढूंढते हैं। हर समय फोन में व्यस्त रहने की वजह से उनके आसपास संस्कारविहीन समाज हो गया है। बच्चों पर समाज, स्कूल और माता-पिता को निगरानी रखना जरूरी है। हर शनिवार को बाल सभाएं होनी चाहिए, ताकि नैतिक शिक्षा की जानकारी बच्चों को हो सके।