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विश्व पटल पर गूंज रहा हिंदी का यशगान, बोलो, सुनो, गुनो...यह अपना अभिमान

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hindi is our proud says older and youngest in loud
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मुरादाबाद। हिंदी दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है। इसको मान दिलाने के लिए हमें भी प्रयास करने होंगे। युवाओं से लेकर बड़ों तक का मानना है कि हिंदी सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि भावों की भाषा है। इसमें अपनापन और आत्मीयता है। इसे बढ़ावा देने के लिए सरकार प्रयासरत है। इस प्रक्रिया को हिंदी पखवाड़े तक सीमित रखने के बजाय धरातलीय प्रयास करने होंगे। यदि उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में इसे अनिवार्य कर दिया जाए तो बोलने और लिखने में भी सहजता आ जाएगी। कारपोरेट जगत को सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित रखने के बजाय लिखने और अन्य गतिविधियों में भी हिंदी को शामिल करना होगा। अमर उजाला की हिंदी हैं हम मुहिम के तहत हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए हर वर्ग और हर उम्र के लोगों ने सुझाव दिए। साथ ही हिंदी पर गर्व करने का आह्वान किया। चिकित्सकों का भी मानना है कि यदि मेडिकल के क्षेत्र में हिंदी को अनिवार्य कर दिया जाए तो आम आदमी की सहूलियतें बढ़ जाएंगी और भाषा समृद्ध हो सकेगी।
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बोलने के साथ लिखने का भी करना चाहिए अभ्यास : डॉ. रामानंद शर्मा
हिंदू कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामानंद शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध हो चुका है। उन्होंने बताया कि 2011-12 उनके ऊपर शोध करने वाले डॉ. राजीव यादव वर्तमान में संस्कृत के प्रवक्ता हैं। इसके अलावा डॉ. रामानंद शर्मा की श्रीकृष्ण के अल्पख्यात कवि नाम की किताब कनाड़ा की कारल्टन यूनिवर्सिटी ओटावा के भारतीय अध्ययन विभाग में पढ़ाई जाती है। चार सौ पेज की इस किताब की कीमत वर्ष 2009 में पांच हजार रुपये थी। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में उन्होंने संस्कृत की एक किताब का हिंदी अनुवाद शुरू कर दिया है। आगामी करीब आठ माह में यह किताब बन जाएगी। डॉ. रामानंद का कहना है कि वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या है कि कोई हिंदी को पढ़ना और लिखना नहीं चाहता है। पहले हिंदी में सुलेख प्रतियोगिताएं होती थीं। परिजनों का हाल जानने के लिए लोग चिट्ठियां लिखा करते थे, लेकिन तकनीकी दौर ने भाषा को कमजोर कर दिया है। अब लोग लिखने से बचने लगे हैं, जबकि किसी भी भाषा का विकास तभी संभव है जब उसे अधिक से अधिक लिखा जाए और बोला जाए। आजकल बच्चे हिंदी में फेल हो जाते हैं। यह बहुत शर्म की बात है। शिक्षकों पर जिम्मेदारी है कि वह अच्छी किताबें लिखें, ताकि बच्चों में किताब पढ़ने की रुचि का विकास हो। किताब से कमाई से ज्यादा पढ़ाई पर जोर दिया जाए तो हम आने वाली पीढ़ी के लिए हिंदी का सुनहरा भविष्य छोड़कर जाएंगे। गर्व से दुनिया हिंदी को आत्मसात करेगी।
गर्व से कहो हम हिंदी भाषी हैं : माहेश्वर तिवारी
वर्ष 2016 में यश भारती सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ नवगीतकार माहेश्वर तिवारी का कहना है कि हमें स्वयं हिंदी भाषा को लेकर किसी तरह की हीनभावना का शिकार नहीं होना चाहिए। बहुत पहले कहा गया है कि सबकी जड़ में आगे बढ़ने का केंद्र अपनी हिंदी भाषा है। अपनी भाषा समृद्ध तभी होगी, जब हम बोलेंगे, लिखेंगे। इससे हिंदी भाषा की प्रगति होगी। अपने देश में बहुत सी भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन एक केंद्रीय भाषा है जो सारे राष्ट्र की भाषा बन जाती है। हमें हिंदी को आगे बढ़ाने में दूसरी भाषा को नुकसान नहीं पहुंचाना, बल्कि हिंदी आगे बढ़ेगी तो दूसरी भाषा भी आगे बढ़ेंगी। दैनिक बोलचाल में, लिखने में, अभिव्यक्त करने के माध्यम में हिंदी का प्रयोग करना चाहिए। जापान में अपनी जापानी भाषा है, रूस में रशियन है। बहुत सारे छोटे-छोटे राष्ट्र की अपनी भाषा है। उन्होंने उसी भाषा के माध्यम से बढ़-चढ़कर विकास किया है। हमें भी अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए। इसका सम्मान करना चाहिए। उसे बोलने-लिखने में निरतंर आगे बढ़ना चाहिए। जैसे अभी हम कहते हैं कि हम भारतीय हैं वैसे ही हमें गर्व से कहना चाहिए कि हम हिंदी भाषी हैं। अंग्रेजी के आगे इसे हीन नहीं बनाना चाहिए। हमारे स्वाधीनता आंदोलन में बहुत से ऐसे लोग थे जो हिंदी भाषी नहीं थे। जैसे सुभाष चंद्र बोस, रविंद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी आदि, लेकिन इन सबने हिंदी को बढ़ाने का प्रयास इसलिए किया कि वह हमारी अपनी भाषा है। यह सबके द्वारा बोली और लिखी जाती है। हम हिंदुस्तानी है। जहां हिंदुस्तान है, वहां स्वाभाविक रूप से हिंदी होगी। धीरे-धीरे हिंदी को अपनाएंगे तो बहुत सारे ज्ञान-विज्ञान जो अभी इस भाषा में नहीं है, वह इससे जुड़ जाएंगे और अपने देश का विकास कर पाएंगे।
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आम लोगों तक पहुंचने के लिए हिंदी में लिखे जाएं चिकित्सकीय दिशा-निर्देश : डॉ. जीएस मर्तोलिया
एसीएमओ डॉ. जीएस मर्तोलिया ने बताया कि सरकार चाहती है कि हम हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करें और जनता में इसका प्रचार करें। देश की ज्यादातर जनता गांव में बसती है। वह हिंदी ही समझती है। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं का ज्ञान कम होता है। इसलिए हमारा दायित्व है कि हमें हिंदी को बढ़ावा देना चाहिए। जब तक प्राइमरी स्तर से हिंदी को बढ़ावा नहीं देंगे, तब तक हिंदी भाषा का विकास नहीं होगा। बच्चों को प्राइमरी स्तर से उच्च स्तर तक हिंदी एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ना चाहिए। स्नातक स्तर तक आते-आते युवाओं का हिंदी समझने में रुझान कम हो जाता है। यदि अनिवार्य रहेगी तो बच्चे पढ़ेंगे और बोलेंगे। डिग्री कालेज की नहीं बल्कि मेडिकल और इंजीनियरिंग में भी इसे समान रूप से लागू करना चाहिए, ताकि हिंदी को बढ़ावा मिले। चिकित्सकों और इंजीनियरों को आम जनता के साथ मिलकर काम करना होता है। यदि चिकित्सकीय क्षेत्र की बात करें तो ज्यादातर मरीज हिंदी बोलते और समझते हैं। ऐसे में मेडिकल में बढ़ावा दिया जाए तो मरीजों के लिए बहुत अच्छा रहेगा। चिकित्सा की तकनीकी भाषा को हिंदी में लिखेंगे तो मरीज आसानी से पढ़ लेंगे और मरीजों का हिंदी और चिकित्सकों पर विश्वास बढ़ेगा।
भाव और संवेदनाओं की भाषा है हिंदी : गरिमा दीक्षित
लाइनपार निवासी गरिमा दीक्षित जीटीवी पर गुड्डन तुमसे न हो पाएगा में सिद्धी का किरदार निभा रही हैं। अब तक गरिमा सावधान इंडिया की पांच कहानियों और बिग मैजिक के शो चक्रधारी अजेय कृष्ण में सत्यभामा का किरदार निभा चुकी हैं। कोरोना संक्रमण काल की वजह से अभी घर आईं गरिमा ने बताया कि अभिनय की रग-रग में हिंदी बसती है। हिंदी की बदौलत ही हम अपने किरदार के भाव और संवेदनाओं को समझ पाते हैं। मुंबई जाने की पहली सीढ़ी हिंदी की समझ होना है। हमें अच्छे से हिंदी बोलनी और समझ में आनी चाहिए। दर्शकों के दिलों में जगह बनाने का माध्यम हिंदी है। बहुत सी विदेशी अभिनेत्री और अभिनेता हैं, जो अच्छी हिंदी बोल लेते हैं। हिंदी भाषा में ही हमें नाते-रिश्ते मिलते हैं। हर रिश्ते को हिंदी ने एक अलग नाम दिया है, जबकि अंग्रेजी में भाव और रिश्ते दोनों ही नहीं हैं। हिंदी सीरियल और फिल्मों को दुनिया में पहचान मिल रही है। वहां से सराहना मिलती है तो हमारा उत्साह बढ़ता है। वास्तविकता यही है कि हिंदी भाषा से अभिनय में निखार आता है। परवरिश भी हिंदी के बीच हुई है। अब भी बातचीत के समय मैं हिंदी को महत्व देती हूं। हिंदी के बिना हमारा कोई आधार नहीं हैं। मैं गर्व करती हूं कि मैं हिंदी भाषी क्षेत्र से हूं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी दे रहीं हिंदी वालों को महत्व : दीपिका शर्मा
बहुराष्ट्रीय कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर दीपिका शर्मा कहती हैं कि हिंदी के बिना हम अपने मनोभावों को प्रदर्शित करने में असहज महसूस करते हैं। हिंदी हमें मां जैसा अपनापन देती है और सफलता के द्वार भी खोलती है। शिक्षण संस्थानों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक सब जगह हिंदी को अनिवार्य कर देना चाहिए। अब निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी इस दिशा में आगे आना होगा। कार्यालयों के कामकाज में हिंदी को बढ़ावा दें। दूसरे देशों की कंपनियां अपने उत्पाद का विज्ञापन हिंदी में करती हैं, लेकिन अन्य लिखा पढ़ी के काम अंग्रेजी में करती हैं और बैठक में भी अंग्रेजी बोली जाती है। ऐसे स्थानों पर भी हिंदी के महत्व को बढ़ाना होगा। हिंदी ना सिर्फ एक भाषा है, बल्कि हमें प्रकृति से भी जोड़ती है। अपने वातावरण में बिना सीखे ही इसे बोलने लगता है। इसीलिए हम सबको हिंदी के मान सम्मान के लिए आगे आना होगा।
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