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Moradabad News: विरासत पर संकट... दो दशक के भीतर घट गए 1.5 लाख दस्तकार

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मुरादाबाद। हस्तशिल्प के कारण पूरे विश्व में अपनी विशेष पहचान रखने वाले मुरादाबाद के लिए अपने शिल्पकारों को सहेजना ही चुनाैती बन गया है। पिछले दो दशक में पीतलनगरी में करीब 1.5 लाख शिल्पकार कम हो गए हैं। 2000 से 2002 के बीच यहां करीब दो लाख लोग दस्तकारी करते थे। इसमें ढलाई, नक्काशी, पॉलिश, रंगाई आदि शामिल है। अब इस काम को करने वाले सिर्फ 50 हजार लोग बचे हैं।
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पद्मश्री बाबूराम यादव पिछले 60 वर्षों से शिल्पकारी कर रहे हैं। पीतल हो एल्युमिनियम के उत्पाद, मुरादाबाद में उनके जैसी नक्काशी करने वाले इक्का-दुक्का ही हैं। इसके लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार मिला। बाबूराम की उम्र अब 76 वर्ष हो गई है और वह आने वाले कुछ वर्षों में काम छोड़ सकते हैं।

बाबूराम के तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा शिक्षक है, मंझला बेटा प्रेस में काम करता है और छोटा बेटे की इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान चलाता है। ऐसे में यह है कि संकट है कि उनके बाद नक्काशी की इस विरासत को कौन संभालेगा। यह बड़ा संकट अकेले एक परिवार का नहीं बल्कि मुरादाबाद के हस्तशिल्प कारोबार का है।
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जिस हस्तशिल्प से मुरादाबाद की पहचान है, उसे बचाना ही चुनौती बन गया है। शिल्पकारों की नई पीढ़ी आर्थिक, सामाजिक कारणों से दूसरे कार्य कर रही है। इसी कारण पीतलनगरी में पीतल का काम बेहद कम हो गया है। शिल्पकारों के कम होने से निर्यातकों ने भी लकड़ी, शीशा, पत्थर व अन्य धातु उत्पादों की ओर रुख किया है।





कच्चा माल, डिजाइन और आर्थिक संकट से जूझ रहे शिल्पकार

पीतलनगरी के शिल्पकारों के सामने तीन बड़े संकट हैं। कच्चे माल की अनियंत्रित कीमतें, मुरादाबाद में डिजाइन बैंक न होने के कारण नए डिजाइनों की कमी और आर्थिक परेशानी। निर्यातकों की ओर से अच्छा मूल्य न मिल पाने के कारण भी नई पीढ़ी इस विरासत को नहीं अपना रही है। उत्पाद बनाने का ऑर्डर मिलते समय कच्चे माल की कीमत कुछ और होती है और जब काम करने के लिए कच्चा माल खरीदा जाता है, तब तक दाम बढ़ चुके होते हैं। इसका बोझ भी शिल्पकारों को ही उठाना पड़ता है। प्रदूषण व स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने के कारण ढलाई की कई भट्ठियां बंद हो चुकी हैं। पीएनजी संचालित भट्ठियों वाला ब्रास फर्नेस भवन भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है।





प्रदेश के हस्तशिल्प निर्यात में आधी हिस्सेदारी मुरादाबाद की

प्रदेश से जितना हस्तशिल्प के उत्पादों का निर्यात होता है, उसमें आधी हिस्सेदारी मुरादाबाद की है। इसके बावजूद हस्तशिल्पियों के प्रोत्साहन व उनके संरक्षण के लिए कोई खास योजना नहीं है। पद्मश्री शिल्पकार दिलशाद हुसैन और पद्मश्री बाबूराम यादव कहते हैं कि सरकार ने प्रशिक्षण के लिए केंद्र खोले, लेकिन वहां प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। लोगों को नया काम शुरू करने के लिए बैंकों से ऋण लेने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार की मंशा साफ है, लेकिन निचले स्तर पर मॉनिटरिंग बढ़े तो शिल्पकारों की मदद हो सकेगी।





इन मोहल्लों में बनते हैं दुनिया में पसंद किए जाने वाले उत्पाद

पीरजादा, मकबरा, बरबालान, मुगलपुरा, करूला, जामा मस्जिद, फैज गंज, गुइयां बाग, मुफ्ती टोला, कटघर।





निर्यातकों व हस्तशिल्पियों की समस्या

जिले के हस्तशिल्प कारोबार के सामने शिल्पकारों की कमी बड़े संकट के रूप में उभर सकती है। वर्तमान में काम चल रहा है, लेकिन आने वाले समय में समस्या न हो इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं। शिल्पकारों के लिए प्रोत्साहन योजनाएं व अन्य सहायता के लिए सरकार से अपील करेंगे। - नीरज खन्ना, अध्यक्ष, ईपीसीएच





वर्ष 2002 तक जिले में दो लाख लोग दस्तकारी का काम करते थे। हर साल यह संख्या कम हो रही है। लगभग 50 हजार लोग ही अब इस काम से जुड़े हैं। इन्हें जोड़े रखना भी चुनौती है। उत्पादन बढ़ाने के लिए शिल्पकार बेहद अहम हैं। - नजमुल इस्लाम, संरक्षक, एमएचईए



मैं नक्काशी करता हूं। पांच बेटों में से दो को रंगाई का काम सिखाया है। वह अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन तमाम दस्तकार साथियों की नई पीढ़ी इस काम में नहीं उतर रही है। लोग दूसरा काम करने दिल्ली, नेपाल चले गए हैं। - पद्मश्री दिलशाद हुसैन, शिल्पकार



शिल्पकार अपने काम से खुश नहीं हैं। उनके साथ कई परेशानियां हैं, जिनमें आर्थिक भी हैं। नए बच्चे पढ़कर लिखकर नौकरी कर रहे हैं। चूंकि यह काम सीखने के लिए लगभग एक साल देना पड़ता है। फैक्टरियों में उत्पादन बढ़े, इसलिए दस्तकारों की संख्या भी बढ़नी चाहिए। - विशाल अग्रवाल, नेशनल चेयरमैन, यस
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