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नींव के पत्थर : दादा-दादी, नानी ने लिखवाई कामयाबी की कहानी

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अपनी दादी और मम्मी के साथ पावनी सिंघल।
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मुरादाबाद। कमजोर पड़ती परिवार की कड़ियों के लिए सीबीएसई दसवीं का परिणाम सबक लेकर आया है। मेधावियों ने अपनी सफलता का श्रेय अपने दादा-दादी और नानी को दिया है। मेधावियों की ये बात इस ओर इशारा करती है कि सफलता के रास्ते को पहचानने के लिए बुजुर्गों का अनुभव और उनका साथ कितना जरूरी है। बुजुर्गों के आस-पास होने से न सिर्फ सकारात्मक माहौल बनता है, बल्कि परीक्षा उत्तीर्ण करने का हौसला भी वह देते हैं।
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प्रदेश में टॉप करने वाली मूलरूप से बरेली निवासी अरीशा खान को जन्म के कुछ दिनों के बाद ही उसकी नानी उसे अपने साथ रामपुर ले आईं थीं। तब से वह यहीं रह रही है और तालीम हासिल कर रही है। नानी के सानिध्य में ही अरीशा ने सफलता की कहानी लिखी है। जनपद में तीसरे स्थान पर रही पावनी का कहना है कि उसकी दादी कामिनी अग्रवाल उनके लिए अलार्म का भी काम करती थीं। इसके अलावा सफलता के लिए पूजा-पाठ करना और हिंदी विषय की तैयारी करवाती थीं। तीसरे स्थान पर रहे कुमार सोहम ने भी अपनी सफलता का श्रेय दादी कलावती देवी को दिया। वह पढ़ सकें, इसके लिए दादी घर के काम खुद ही कर देती थीं। उन्हें भरोसा था कि मैं टॉपर बनूंगा। छठवें स्थान पर रहे छात्र अभिनीत अग्रवाल ने बताया कि दादा विनोद कुमार अग्रवाल ने लक्ष्य निर्धारित करना और उसे प्राप्त करने तक लगातार मेहनत करने की सीख दी। इसके अलावा श्रीरामचरित मानस का पाठ करने को भी प्रोत्साहित करते थे, ताकि मैं सकारात्मक रह सकूं।
अनुभव बहुत बड़ी चीज है। दादा-दादी के शारीरिक बल में भले ही कमी आ जाए, लेकिन वह समस्याओं का बना बनाया हल प्रस्तुत कर देते हैं। उनके पास समाधान करने का यह तरीका पुरानी पीढ़ी से आया होगा। उस प्रक्रिया में कमी पाई होगी तो उसमें सुधार कर हमें बताते हैं। आया से हमें भावनात्मक संबंध नहीं मिल सकते हैं, लेकिन दादा-दादी देखभाल के साथ प्यार और दुलार देते हैं। उनके संरक्षण में बचपन सुरक्षित रहता है। माता-पिता से ज्यादा दादा-दादी ध्यान रखते हैं। आज के परिवारों की बहुत बड़ी जरूरत दादा-दादी हैं। कोरोना काल ने भी यही सिखाया है कि परिवार से किसी भी परेशानी को दूर किया जा सकता है। परिवार के साथ निराशा नहीं होती है। मुश्किल वक्त में भी खुशियां छा जाती हैं। सोशल मीडिया पर संवादहीनता के साथ निराशा को बढ़ावा मिलता है। कई बार आत्महत्या तक स्थिति पहुंच जाती है। परिवार मजबूत होता है तो समस्याएं बड़ी नहीं लगती हैं।
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- डॉ. अंचल गुप्ता, एसोसिएशन प्रोफेसर, समाजशास्त्र, गोकुलदास हिंदू गर्ल्स कालेज।
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