महात्मा गांधी यानी आजादी के संग्राम के वह महानायक जिनकी अगुवाई में पूरा देश बिना हथियारों के अंग्रेजी हुकूमत से जंग लड़ रहा था। अक्तूबर 1920 में उन्हीं राष्ट्रपिता ने मुरादाबाद आकर असहयोग आंदोलन की नींव रखी। उनके आह्वान पर छात्रों ने ब्रिटिश सरकार के स्कूल-कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों में जाने से इन्कार कर दिया था।
गांधी जी सितंबर 1920 में मुरादाबाद आए थे। यहां उन्होंने डॉ. भगवान दास की अध्यक्षता में महाराजा टाकीज (वर्तमान में सरोज सिनेमा) में एक बैठक को संबोधित किया था, जिसमें असहयोग आंदोलन की भूमिका बनाई गई थी।
बापू रघुवीर सरन खत्री की बग्गी में बैठकर अमरोहा गेट पहुंचे और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। इस पुस्तकालय में महात्मा गांधी के जीवन से संबंधित तमाम पुस्तकें उपलब्ध हैं। तीसरी बार महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी के कलकत्ता (कोलकाता) अधिवेशन में जाते समय कुछ समय मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर रुके थे। उन्होंने स्थानीय लोगों के निवेदन पर स्टेशन पर ही सभा को संबोधित किया था।
डॉ. मनोज रस्तोगी बताते हैं कि असहयोग आंदोलन की योजना पर पुनर्विचार और मूर्त रूप देने के लिए मुरादाबाद में कांग्रेस का संयुक्त प्रांतीय सम्मेलन नौ से 11 अक्तूबर 1920 को आयोजित किया गया था। नौ अक्टूबर की सुबह अली बंधुओं (शौकत अली व मोहम्मद अली) के साथ महात्मा गांधी मुरादाबाद आ गए थे।
महाराजा थिएटर (सरोज सिनेमा) में बाबू भगवान दास ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कलकत्ता (अब कोलकाता) में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत असहयोग आंदोलन की योजना पर मतभेदों और कांग्रेस से अलग हो गये उदारवादी नेताओं की चर्चा की।
अगले दिन यानी 10 अक्तूबर को इस पर विस्तृत चर्चा हुई। चर्चा के दौरान फिर तमाम मतभेद खुल कर सामने आये। बाद में प्रस्ताव पूर्ण बहुमत से पारित हो गया। सम्मेलन के अंतिम दिन 11 अक्तूबर को समापन सत्र में महात्मा गांधी ने कहा कि बहुत गंभीर चिंतन के बाद भी मैं यही मानता हूं कि देश की स्वतंत्रता का एकमात्र मार्ग असहयोग ही है।