मुरादाबाद। कोरोना वायरस ने जिंदगी छीन ली और हालातों ने अस्थियों के विसर्जन का इंतजार बढ़ा दिया है। शहर के मोक्षधाम में अंतिम संस्कार के बाद बहुत से शवों की अस्थियां रखीं हुईं हैं। मृतकों के परिवार के सदस्यों के कोरोना संक्रमित होने के कारण वे अस्थियों को भी नहीं बीन पा रहे हैं। अस्थियां बीनने का काम तो मोक्ष धामों की समितियों ने कर दिया, लेकिन अब इन अस्थियों को विसर्जित होने का इंतजार है।
ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस समय लोगों को अपने कर्तव्य कर्म करना चाहिए। वर्तमान हालातों में अपने जीवन को बचाना सबसे बड़ा कर्तव्य कर्म है। अस्थियों को हालात सामान्य होने के बाद तीर्थ स्थानों पर पूर्ण विधि-विधान के साथ विसर्जित किया जा सकता है। मुरादाबाद में पिछले 15 दिनों में कोरोना संक्रमित मामलों की संख्या प्रतिदिन चार सौ के आसपास रही है, जबकि शहर के पांच मोक्षधामों में पिछले एक सप्ताह में 50 से अधिक अंतिम संस्कार रोजाना किए गए हैं। कोरोना से बिगड़ते हालातों में शहर के हर दूसरे परिवार में व्यक्ति इस महामारी से पीड़ित हैं। बहुत से घर ऐसे हैं, जिसमें सभी के सभी परिजन संक्रमित हैं। अध्यक्ष भारत विकास परिषद मैत्री अजय कट्टा ने बताया कि संस्था की ओर से संचालित रामनगर विहार स्थित मोक्षधाम में पहले अंतिम संस्कार के दो दिन बाद तक अस्थियां बीनने आ जाते थे, लेकिन अब परिजनों के संक्रमित होने की वजह से वह आ नहीं पा रहे हैं। ऐसे में हम कर्मचारियों से कह कर अस्थियां एकत्र करवा लेते हैं और परिजनों को फोन कर देते हैं। जो परिजन आने की स्थिति में होते हैं वो अस्थियों को ले जाते हैं, जबकि अन्य की अस्थियां मोक्षधाम में ही रखीं हैं।
परिस्थितियां सामान्य होने पर भी विसर्जित हो सकती हैं अस्थियां
ज्योतिषाचार्य डा. जगदीश प्रसाद कोठारी का कहना है शास्त्रों में दसवां का दस दिन का विधान है। इससे पहले ही अस्थियां विसर्जित करने का विधान है, लेकिन इस आपदा के समय में कोई कार्य विधि विधान से नहीं हो पा रहा है। इसलिए जब स्थितियां सामान्य हो जाएं, तब अस्थियों का विसर्जन हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज आदि तीर्थों पर जाकर करना चाहिए। वहां पर 10वां 13वीं और ब्रह्मभोज पूर्ण विधि-विधान से करें, पिंड दान करेंगे तो मृतकों की आत्माओं को शांति मिलेगी। सबसे पहले जीवन है। जब हमारा शरीर होगा तो हम किसी के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होगा। धर्म, कर्म और आध्यात्म को कर पाएंगे। समय-समय पर धर्म की परिभाषा बदलती है। जब हम खुद को, परिवार को, राज्य को सुरक्षित रख पाएंगे तो अपने राष्ट्र धर्म को निभा पाएंगे।