बच्चों को कुछ अलग बनाने की चाह में पैरेंट्स उनका बचपन छीन रहे हैं। बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोप रहे हैं और उनसे अपने सपने पूना कराना चाहते हैं। थोड़ा और की चाहत में बच्चों की छुट्टियां की खत्म कर दी हैं। समर वैकेशन को भी स्टडी लीव बना दिया है। जिसके चलते बच्चों पर दबाव बढ़ रहा है और वे अपनी मासूमियत खोकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं। जिसका आगे चलकर उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे पैरेंट्स से अलग अपनी प्लानिंग करते हैं। दादा दादी, नाना नानी के पास जाने के अलावा कहीं घूमने की मन बना लेते हैं। समर वैकेशन होने के साथ ही मम्मी पापा से जिद शुरू हो जाती है। कुछ उनकी जिद मान लेते हैं तो कुछ उनसे छुट्टियों को कुछ सीखने में लगाने में लगाने की कह देते हैं। इसके बाद शुरू होती है बच्चों की तैयारी। इसके लिए उन्हें स्पेशल क्लासेज, समर कैंप, एकेडमी, कोचिंग में भेजना शुरू कर देते हैं। बच्चे ना चाहते हुए भी जाते हैं, लेकिन इसका असर अधिकांश बच्चों पर सकारात्मक नहीं रहता। कभी कभी इसका असर उल्टा ही होने लगता है।
बच्चों पर खर्च को ना समझे इनवेस्टमेंट
मनोचिकित्सक डा. नीरज गुप्ता कहना है कि माता पिता बच्चों पर होने वाले खर्च को इनवेस्टमेंट मानने लगे हैं। इसके बदले में उनसे रिटर्न की चाहत बढ़ने लगी है। बच्चों को जताते हैं कि अपने खर्चों में कटौती करके उन्हें पढ़ा रहे हैं। इससे बच्चे पर कुछ करने का दबाव आ जाता है। परिणाम रिजल्ट नहीं दे पाता तो परेशान हो जाता है और घातक कदम उठा लेता है। सभी बच्चों का मेंटल लेबर एक समान नहीं होता, इसलिए जरूरी नहीं कि पड़ोसी का बच्चा सीखकर उसका प्रदर्शन कर रहा है तो हम भी अपने बच्चे को उसका उलाहना दें। पैरेंट्स को बच्चों की क्षमताओं का मूल्यांकन करना आना चाहिए। एक दो घंटे की पढ़ाई तक तो ठीक है उससे ज्यादा के लिए दबाव बनाना ठीक नहीं। उन्हें अपने स्तर पर खेलने कूदने देना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर बच्चे अपनी मासूमियत खो रहे हैं। समय से पहले बड़े हो रहे हैं। दबाव में डिप्रेशन का शिकार होते हैं। एंग्जाइटी के बीमारी लगती है।
बच्चे अगर कहें तभी कराए स्पेशल क्लास
मनोविज्ञानी डा. मीनू मेहरोत्रा का कहना है हम टीवी पर बच्चों को प्रेजेंटेशन देते हुए देखकर उसमें अपने बच्चे को तलाशने लगते हैं। जरूरी नहीं कि टीवी पर आने वाला बच्चा जो कर रहा है वह सभी के बच्चे कर पाएं। सभी की क्षमता और योग्यता अलग अलग है। कोचिंग को कैंप में भेजकर बच्चे को सचिन तेंदुलकर या साइना नेहवाह नहीं बनाया जा सकता। समर वैकेशन में बच्चों को थोड़ी बहुत पढ़ाई के साथ वह करने दें जो वो करना चाहते हैं। उन्हें एकेडमी के बजाय उनके साथ के बच्चों के साथ खेलने दें। बच्चों को अपना इनवेस्टमेंट न समझें।
हमेशा नहीं होता घाटे का सौदा
मुरादाबाद। छुट्टियों में बच्चों को अलग अलग कोर्स कराना फायदे का सौदा भी रहता है। लेकिन उन्हीं हालात में इसका फायदा मिलता है जब बच्चा खुद इसके लिए तैयार हो। कुछ केस में बच्चे ना नुकुर के बाद उत्साह दर्शाने लगते हैं। बाद में उनमें सीखने की ललक भी पैदा होती है। साथ ही हमेशा कुछ अलग करने की प्रवृत्ति भी जागती है।