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Moradabad News: ईपीसीएच सदस्यता शुल्क में 60 फीसदी वृद्धि से हिले निर्यातक

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मुरादाबाद। हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) के सदस्यता शुल्क में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी ने निर्यातकों को नई चिंता में डाल दिया है। पहले अमेरिकी टैरिफ की मार, फिर पश्चिम एशिया युद्ध से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आई चुनौतियों से थमे निर्यात के बीच सदस्यता शुल्क की महंगाई न सिर्फ कारोबारियों को अखर रही है, बल्कि ज्यादातर निर्यातक गलत समय पर लिया गया गलत फैसला करार दे रहे हैं।
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निर्यातकों का कहना है कि लंबे समय से निर्यात से जुड़ा बाजार उथल-पुथल झेल रहा है। ट्रंप की शर्तों के बीच अमेरिकी टैरिफ की मार से निर्यात ठिठक गया था। अमेरिका का रुख बदलने से आई टैरिफ की नरमी ने जब बाजार को सामान्य स्थितियों में लाना शुरू किया तो इस्राइल-अमेरिका बनाम ईरान की जंग शुरू हो गई। इस युद्ध से सभी बड़े देशों के प्रभावित होने के कारण निर्यात के नए आर्डर रुक गए। साथ ही स्क्रैप आदि के आयात पर पाबंदियां और खर्चे बढ़ने से कच्चे माल की कीमतें आसमान पर पहुंच गई। इससे निर्यात की बचीखुची गुंजाइश भी हाथ से निकलती लगने लगी।



इस बीच ईपीसीएच के सदस्यता शुल्क की सालाना राशि पांच हजार से आठ हजार रुपये करने का संदेश सामने आ गया। इससे निर्यातक हिल गए। उनका कहना है कि ईपीसीएच के गठन की अवधारणा के पीछे निर्यात और निर्यातकों के हित की प्राथमिकता की सोच है। विश्व के मौजूदा परिदृश्य के लिहाज से ईपीसीएच को खुद कारोबार के प्रोत्साहन की योजना सामने लानी चाहिए थी। सरकार से भी सपोर्ट सिस्टम के प्रयास करने चाहिए थे। इसके उलट अपने ही शुल्क में बढ़ोत्तरी करके ईपीसीएच ने निर्यातकों को नई चुनौती में पहुंचा दिया है।
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अंतरराष्ट्रीय स्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं। दिल्ली मेला हो या विदेशी फेयर, निर्यातकों को न अपेक्षा के अनुसार ग्राहक मिले और न ही अच्छे आर्डर हाथ आए। इन स्थितियों में ईपीसीएच सदस्यता शुल्क बढ़ाना निराशाजनक है। इस वक्त ईपीसीएच का मैनेजमेंट अजीब भूमिका में है। निर्यातकों के सामूहिक हित के स्थान पर चंद लोगों को ध्यान में रखकर निर्णय लिए जा रहे हैं। ईपीसीएच को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। - अनूप शंखधार, पूर्व उपाध्यक्ष ईपीसीएच



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पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से निर्यात कारोबार ठप जैसी स्थिति में है। सभी सरकार से मदद मांग रहे हैं। निर्यातकों से लेकर कारीगरों तक का हौसला बनाए रखने वाले फैसलों की उम्मीद कर रहे हैं। इस वक्त में ईपीसीएच सदस्यता शुल्क बढ़ाकर निर्यातकों के ऊपर एक और आर्थिक बोझ डाल दिया है। जबकि ईपीसीएच को निर्यातकों की मदद करनी चाहिए थी। - विशाल अग्रवाल, निर्यातक



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इस वक्त निर्यातक छोटे से खर्च और रकम को लेकर भी चिंतित हैं। किसी प्रकार से पीतलनगरी के विरासती हस्तशिल्प के काम को बचाने के प्रयास हो रहे हैं। छोटी सी महंगाई भी बड़ी मुसीबत साबित हो रही है। इस समय पर ईपीसीएच को सदस्यता शुल्क नहीं बढ़ाना चाहिए था। बढ़े हुए शुल्क की हम कड़ी निंदा करते हैं। ईपीसीएच को इस फैसले को वापस लेना चाहिए। - डॉ. रजत सिंघल, निर्यातक
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