कोरोना की आड़ लेकर केवल अयोध्या (फैजाबाद) की जेल में बंद फांसी के चार मुजरिमों को पैरोल पर छोड़ने में ही लापरवाही नहीं बरती गई, बल्कि मुरादाबाद जिला कारागार की सलाखों से भी 22 उम्रकैदी पैरोल पर छोड़े गए हैं। सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि सात साल की सजा पाए सजायाफ्ता उम्रदराज कैदियों को ही पैरोल पर रिहा किया जाए, लेकिन जेल प्रशासन से लेकर शासन तक सभी जिम्मेदारों ने आंखें मूंदकर पैरोल की फाइलों पर हस्ताक्षर किए। वहीं, पैरोल पर छोड़े गए मुजरिम हत्या, लूट, डकैती और दुष्कर्म जैसी संगीन वारदातों को अंजाम देने में सजा काट रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना की पहली लहर के दौरान राज्य सरकार को उच्च शक्ति समिति (हाई पावर कमेटी) बनाकर उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद छोटे अपराध करने वाले उम्रदराज कैदियों को पैरोल पर छोड़ने का आदेश दिया था, ताकी कैदियों के बीच कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जाए। इसके बाद शासन के आदेश पर मुरादाबाद जिला जेल में बंद कैदियों को भी छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जिलास्तर पर गठित चार सदस्यीय कमेटी की सिफारिश पर मुरादाबाद जिला जेल से संभल और अमरोहा के कैदी रिहा किए गए थे। इन्हें आठ सप्ताह के लिए पैरोल दी गई थी।
वहीं, पैरोल पूरी होने के बाद भी 74 कैदी वापस नहीं आए। इनकी तलाश में पुलिस जुटी थी कि इसी बीच दूसरी लहर ने दस्तक दे दी। इसके बाद पैरोल बढ़ा दी गई। अब भी मुरादाबाद जेल से पैरोल पर छोड़े गए 107 कैदी बाहर हैं। इसमें 77 कैदी ऐसे हैं जिन्हें सात साल या उससे कम की सजा हुई है। इसके अलावा आठ कैदियों को सात साल से ज्यादा की सजा मिली है। जबकि 22 मुजरिम उम्रकैदी हैं। इसमें 13 मुजरिम मुरादाबाद, छह अमरोहा और तीन संभल के हैं। अयोध्या के मामले में हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को तलब किया तो जेल प्रशासन और जिला प्रशासन के अलावा शासन तक हड़कंप मचा हुआ है।
मुरादाबाद जिला जेल से पैरोल पर छोड़े गए कैदी
सात साल या उसके कम सजा वाले कैदी- 77
सात साल से ज्यादा साल की सजा वाले कैदी-08
उम्रकैद की सजा पाए बंदी- 22
1888 में बनीं मुरादाबाद जिला जेल में मुरादाबाद, अमरोहा और संभल के करीब 36 सौ कैदी और बंदी हैं। जबकि जेल की क्षमता 715 कैदियों की है। जेल में क्षमता से पांच गुना ज्यादा कैदी और बंदी है। इस कारण आए दिन जेल में सोने और बैठने को लेकर भी बंदियों में मारपीट होती रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जेल में बंद कैदियों में कोरोना संक्रमण फैलने से रोने के लिए भीड़ कम की जाए और क्षमता बढ़ाई जाए। इसके लिए सात साल से कम सजा पाए उम्रदराज बंदियों को पैरोल पर रिहा किए जाए।
देश में ओमिक्रोन की दस्तक के बाद जेलों में ही सतर्कता बढ़ाई है। पहली और दूसरी लहर में छोड़े गए कैदियों की वापसी होनी थी, सात दिसंबर को फिर से सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।
शासन के आदेश पर जिला स्तर पर डीएम, एसएसपी, वरिष्ठ जेल अधीक्षक और जिला प्रोबेशन अधिकारी की सदस्यता वाली कमेटी गठित हुई थी। जेल में बंद कैदियों की ओर से पैरोल रिहाई के लिए आवेदन मांगे गए थे। कमेटी ने आवेदनों की जांच कर रिपोर्ट शासन को भेजी थी। शासन के आदेश पर ही पैरोल पर कैदियों को रिहा किया गया था।
- डा. वीरेश राज शर्मा, वरिष्ठ जेल अधीक्षक, जिला कारागार मुरादाबाद