देश में बीफ पर चाहे जितना हो हल्ला मचा हो लेकिन हमेशा से गाय भारतीय संस्कृति के वांगमय का हिस्सा रही है। गाय के बगैर सनातन परंपरा में कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं होता।
गाय की महत्ता को देखना समझना है तो विन्ध्य पर्वतमाला की गोद में पहुंचना होगा। यहां भी एक वृंदावन पुष्पित पल्लवित हो रहा है।
अवसर था गोपाष्टमी का जिससे देखने समझने के लिए देश के कोने कोने से लोग विन्ध्य पर्वत के अंचल में पहुंचे थे। यहां गुरुवार को लाखों रुपये की लागत से पांच हजार गायों को सजा संवार कर विधिवत पूजा अर्चना की गई।
श्रद्धा और संस्कृति को बचाने की पहल वर्षों से देवराहा हंस बाबा के आश्रम में चल रही है। जहां दो मंजिला भवन मेें पांच हजार गायों का लालन पालन पूरे श्रद्धाभाव से किया जाता है।
खास बात यह है कि सभी देशी नस्ल की गायें ही यहां पाली जाती हैं। गाय पालन और उनकी सेवा की जो विविधता यहां देखने को मिल रही है वह अल्कल्पनीय है। गायें न केवल यहां की माटी में प्रवास कर रही हैं बल्कि यहां उनके मूत्र से औषधियों का निर्माण किया जा रहा है जो मानवता की बहुत बड़ी सेवा साबित हो रहा है।
यहां बने गोमूत्र अर्क और गोमूत्र धनवटी के सेवन से कई असाध्य रोगों से जूझ रहे लोगों को फायदा पहुंचा है।
गायों की सेवा के लिए स्वयं हंस देवरहा बाबा गौशालाओं में पहुंचते हैं और अपने हाथों से गायों को चारा आदि खिलाते हैं। उनके स्नेहिल स्वभाव को देख गायें मंत्रमुग्ध दिखाई पड़ने लगती हैं।
भक्त नारायण दास बताते हैं कि प्रति वर्ष इन गायों को खिलाने के लिए करोड़ों रुपये का भूसा खरीदा जाता है।
खली चूनी के अलावा पर्वों पर पहुंचने वाले लोग गायों को फल फूल आदि का चढ़ावा चढ़ाते हैं। दिन में कई एक ड़ में फैले विन्ध्य की पहाड़ियों पर चरने वाले गउवों को देख यहां का दृश्य सहज वृंदावन जैसा दिखने लगता है।