बरौंधा स्थित आरटीओ कार्यालय पर खाली पड़ी अधिकारी की कुर्सी।
संभागीय परिवहन विभाग में इन दिनों दलालों का कब्जा हो गया है। बगैर दलालों के कोई काम नहीं हो पाता है। किसी का किसी तरह हो भी गया तो उसे महीनों विभाग का चक्कर लगाना पड़ता है तब उसका काम होता है। इसका एक मुख्य कारण विभाग में तैनात लिपिकों का ड्यूटी से गायब रहना बताया जा रहा है।
अमर उजाला की टीम सोमवार को आरटीओ आफिस की जमीनी हकीकत जानने पहुंची तो वहां का मंजर देख कर हैरान हो गई। पाया कि आरटीओ विभाग में इन दिनों दलालों की भरमार हो गई है। सड़क से लेकर दफ्तर तक कई दलाल नजर आए। जैसे ही कोई व्यक्ति लाइसेंस या वाहन के अन्य काम से आरटीओ दफ्तर आता था वैसे ही दलाल उसको घेर लेते थे। पूछताछ कर पहले उनके आने का मकसद पता करते थे और जब उन्हें यकीन हो जाता था कि वह लाइसेंस बनवाने आया है तो उसे इतना बरगला दे रहे थे कि वह उनके जाल में फंस जा रहा था। इसके बाद उनसे ही अपना काम कराने की जिम्मेदारी सौंप दे रहा था। जिसका फायदा उठाते हुए बिचौलिए उनसे मोटी रकम वसूलने का काम करने लगे। जिसमें सबका हिस्सा बंधा होता है।
कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रमुख सचिव नवतेज सिंह ने औचक छापेमारी की थी तो तीन दलाल पकड़े गए थे। साथ ही एक लिपिक के पास काटे गए निर्धारित रसीद से अधिक पैसा बरामद हुआ था। जिसके आरोप में वह जेल भी गया था। इसके बाद से कोई औचक छापेमारी नहीं हुई ना की कोई ऐसी कार्रवाई। जिससे दलालों में डर बन सके। वहीं नगर निवासी राजकुमार की माने तो वह तीन महीने तक आरटीओ आफिस का चक्कर काटते रहे लेकिन उनका लाइसेंस नहीं बन सका। थक कर उन्होंने बिचौलिए को दो हजार रुपये दे लिया। इसके बाद उसका लाइसेंस बन गया। कहा कि दोबारा वह अपने भाई का लाइसेंस बनवाने आया हूं। इसके लिए दलाल को दो हजार रुपये दे दिया है जो लाइसेंस बनवाने के बाद पहुंचा देगा।